दोहे
by कबीर, रहीम, वृंद
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इस पाठ में तीन कवियों, कबीर, रहीम और वृंद, के आठ नीति-दोहे संकलित हैं, जो जीवन को सही ढंग से जीने की सीख देते हैं। कबीर के चार दोहे बताते हैं कि (1) मनुष्य की पहचान ऊँचे कुल या जाति से नहीं, बल्कि उसके अच्छे आचरण से होती है, शराब भरा सोने का कलश भी निंदा का पात्र होता है; (2) निंदक (आलोचक) को अपने पास ही रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना साबुन-पानी के ही हमारी कमियाँ बताकर हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है; (3) गुरु कुम्हार के समान है और शिष्य घड़े के समान, गुरु भीतर से स्नेह और बाहर से कठोरता देकर शिष्य को दोषरहित, ज्ञानवान व चरित्रवान बनाता है; (4) जैसे नाव में भरता पानी उलीच देना चाहिए, वैसे ही घर में बढ़ते धन को दान कर देना चाहिए, वरना धन की अधिकता पतन ला देती है। रहीम के दो दोहे कहते हैं कि बुरे समय (पावस) में सज्जन कोयल की तरह मौन हो जाते हैं और तुच्छ लोग मेढक की तरह टर्राते हैं; तथा खैर, खून, खाँसी, खुशी, वैर, प्रीति और मद, ये सात बातें दबाए नहीं दबतीं। वृंद के दो दोहे बताते हैं कि निरंतर अभ्यास से मूर्ख भी चतुर बन जाता है (जैसे रस्सी की रगड़ से पत्थर पर निशान पड़ जाता है) और आँखें दर्पण की तरह मन के हित-अहित को स्वयं प्रकट कर देती हैं।
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कबीर के दोहे, आचरण, आलोचना, गुरु और दान
पहले दोहे में कबीर कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म लेने भर से कोई महान नहीं हो जाता; यदि उसका आचरण अच्छा न हो तो वह उसी तरह निंदा का पात्र है जैसे शराब से भरा सोने का कलश। मनुष्य की पहचान उसके वर्ण, जाति या धन से नहीं, बल्कि उसके कर्म और चाल-चलन से होती है।
दूसरे दोहे में कबीर निंदक को आँगन में कुटी बनवाकर अपने पास रखने की सलाह देते हैं, क्योंकि आलोचक ही हमें हमारी कमियाँ दिखाकर बिना साबुन-पानी के हमारा स्वभाव निर्मल कर देता है।
गुरु-महिमा और धन का दान
तीसरे दोहे में गुरु को कुम्हार और शिष्य को घड़ा बताया गया है, गुरु भीतर से हाथ का सहारा (स्नेह) देकर और बाहर से चोट (कठोर अनुशासन) देकर शिष्य के दोष दूर करता है और उसे ज्ञानवान तथा चरित्रवान बनाता है।
चौथे दोहे में कबीर कहते हैं कि जैसे नाव में भरता पानी दोनों हाथों से उलीच देना ही समझदारी है, वैसे ही घर में आवश्यकता से अधिक बढ़ता धन दान कर देना चाहिए, क्योंकि धन की अधिकता विकृतियाँ और विनाश लाती है।
रहीम और वृंद के दोहे
रहीम कहते हैं कि पावस (वर्षा) ऋतु में कोयल मौन साध लेती है और मेढक टर्राने लगते हैं, अर्थात् बुरे समय में सज्जन चुप रहते हैं और तुच्छ लोग बोलने लगते हैं। दूसरे दोहे में वे कहते हैं कि खैर, खून, खाँसी, खुशी, वैर, प्रीति और मदपान, ये दबाए नहीं दबते, प्रकट हो ही जाते हैं।
वृंद के दोहे सिखाते हैं कि निरंतर अभ्यास से जड़बुद्धि भी चतुर बन जाता है, जैसे कुएँ की रस्सी की रगड़ से पत्थर पर निशान पड़ जाता है; और आँखें निर्मल दर्पण की तरह मन के हित-अहित तथा भले-बुरे भाव को स्वयं बता देती हैं।
