बड़े घर की बेटी
by मुंशी प्रेमचंद
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'बड़े घर की बेटी' मुंशी प्रेमचंद की एक लोकप्रिय सामाजिक कहानी है जो संयुक्त परिवार के महत्व, स्त्री के स्वाभिमान, त्याग और सहनशीलता को रेखांकित करती है। गौरीपुर के जमींदार बेनीमाधव सिंह के दो पुत्र हैं, सुशिक्षित श्रीकंठ सिंह और अनपढ़ लालबिहारी सिंह। श्रीकंठ की पत्नी आनंदी और देवर लालबिहारी के बीच 'घी और मांस' पकाने को लेकर विवाद हो जाता है और लालबिहारी क्रोध में आनंदी पर खड़ाऊँ फेंक देता है। श्रीकंठ अपमान से आहत होकर परिवार से अलग होने की ठान लेते हैं, पर अंत में आनंदी अपनी उदारता से लालबिहारी को क्षमा कर बिखरते परिवार को जोड़ लेती है।
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कहानी गौरीपुर गाँव के जमींदार और नंबरदार बेनीमाधव सिंह के परिवार से शुरू होती है, जिनकी आर्थिक स्थिति अब कमजोर हो चुकी है। उनके दो पुत्र हैं, बड़े श्रीकंठ सिंह बी.ए. पास, संयुक्त परिवार के प्रबल समर्थक और अंग्रेज़ी सभ्यता के आलोचक हैं; छोटे लालबिहारी सिंह एक अनपढ़, बलवान देहाती युवक हैं। श्रीकंठ का विवाह ताल्लुकदार भूपसिंह की चौथी बेटी आनंदी से हुआ है, जो सुख-सुविधाओं में पली-बढ़ी होने पर भी संस्कारी है और सादे ससुराल में स्वयं को ढाल लेती है।
घी और मांस का विवाद
एक दिन लालबिहारी दो चिड़ियाँ शिकार करके लाता है और भाभी से जल्दी पकाने को कहता है। रसोई में केवल पाव-भर घी था, जिसे आनंदी मांस में डाल देती है। दाल में घी न पाकर लालबिहारी चिल्लाता है और आनंदी के मायके का अपमान करता है, 'क्या तुम्हारे मायके में घी की नदियाँ बहती हैं?' आनंदी के उत्तर देने पर क्रोधित लालबिहारी उस पर खड़ाऊँ फेंक देता है, जिससे उसकी उँगली में चोट लग जाती है।
अलगाव और मेल-मिलाप
शनिवार को श्रीकंठ घर लौटते हैं तो आनंदी की शिकायत सुनकर उनका स्वाभिमान जाग उठता है और वे अलग होने की बात कहते हैं। घर टूटने की खबर से गाँव के पड़ोसी तमाशा देखने को उत्सुक हो जाते हैं। पर लालबिहारी को अपनी भूल का अहसास होता है और वह पश्चाताप के आँसुओं के साथ भाभी से विदा लेने पहुँचता है। उसके रोने से आनंदी का हृदय पिघल जाता है; वह उसे रोककर श्रीकंठ से क्षमा का आग्रह करती है। दोनों भाइयों का मिलाप देखकर बेनीमाधव सिंह गर्व से कहते हैं, 'बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं, बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।'
