युवाओं से
by स्वामी विवेकानंद
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'युवाओं से' स्वामी विवेकानंद के क्रांतिकारी और प्रेरक विचारों का संकलन है, जो देश के युवाओं को अकर्मण्यता, अंधविश्वास और हीनभावना से बाहर निकालकर राष्ट्र-निर्माण में लगाने की प्रेरणा देता है। स्वामी जी का मानना है कि देश की समस्त आशा नई पीढ़ी पर टिकी है। वे 'त्याग' और 'सेवा' को भारत के दो राष्ट्रीय आदर्श बताते हैं, कमजोरी को मृत्यु के समान मानते हैं, शारीरिक विकास (गीता से पहले फुटबॉल) पर बल देते हैं और आत्मविश्वास को ही सच्ची आस्तिकता कहते हैं।
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विवेकानंद जी युवाशक्ति को जागृत करने के लिए उपनिषद के मंत्र 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत' (उठो, जागो और लक्ष्य-प्राप्ति तक मत रुको) का उद्घोष करते हैं। उन्हें देश के नवयुवकों पर अटूट विश्वास है; वे युवाओं को सिंह के समान साहसी बताते हैं जिन्हें अपनी सोई शक्तियों को पहचानना है।
त्याग, सेवा और शारीरिक शक्ति
स्वामी जी 'त्याग' और 'सेवा' को भारत के दो राष्ट्रीय आदर्श कहते हैं, वही व्यक्ति वास्तव में जीवित है जो दूसरों के लिए जीता है। वे शारीरिक विकास पर बल देते हुए अनूठा विचार देते हैं कि युवाओं को गीता के शुष्क अध्ययन से पहले फुटबॉल खेलना चाहिए; लोहे की मांसपेशियों और फौलादी स्नायुओं से ही गहन आध्यात्मिक ज्ञान सुलभ होता है।
कमजोरी और आत्मविश्वास
वे कमजोरी की तीव्र निंदा करते हैं, 'कमजोरी ही पाप है और कमजोरी ही मृत्यु है।' आत्मविश्वास के विषय में वे कहते हैं कि पुराना धर्म ईश्वर में विश्वास न करने वाले को नास्तिक कहता था, पर नया वेदांत कहता है कि जो स्वयं पर विश्वास नहीं करता वही सबसे बड़ा नास्तिक है। युवाओं को संकीर्णता, जातिवाद और दलबंदी से ऊपर उठकर दरिद्रनारायण (गरीबों) की सेवा में जुट जाना चाहिए।
