दोपहर का भोजन
by अमरकांत
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'दोपहर का भोजन' अमरकांत की हिंदी की सबसे मर्मस्पर्शी यथार्थवादी कहानियों में से एक है, जो बेरोजगारी और भीषण गरीबी से जूझते एक मध्यमवर्गीय परिवार के भूख के संघर्ष और एक माँ के त्याग को दर्शाती है। मुंशी चंद्रिका प्रसाद की नौकरी छूट जाने से परिवार भुखमरी की कगार पर है। दोपहर के भोजन में सिद्धेश्वरी थोड़ी-सी रोटियों में सबका पेट भरने के लिए मीठे झूठ बोलती है और अंत में स्वयं आधी रोटी में से भी आधी बीमार बेटे के लिए रखकर, बची चौथाई रोटी और पानी पीकर चुपचाप रो पड़ती है।
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गर्मियों की तपती दोपहर में रसोई में बैठी सिद्धेश्वरी की आँखों में चिंता और पेट में भूख की आग है। मुंशी चंद्रिका प्रसाद की नौकरी छूटने से महीनों से राशन जुटाना कठिन है; सबसे छोटा छह वर्षीय बेटा प्रमोद कुपोषण से हड्डियों का ढाँचा बनकर खाट पर पड़ा है।
मीठे झूठ और त्याग
सबसे पहले बड़ा बेटा रामचंद्र (प्रेस में प्रूफरीडिंग सीखता) आता है; सिद्धेश्वरी उसे झूठ कहती है कि घर में बहुत भोजन है और मोहन उसकी तारीफ कर रहा था, रामचंद्र दो रोटियाँ खाकर पेट भरा बता देता है। फिर मंझला बेटा मोहन आता है; उसे भी झूठ कहकर वह डेढ़ रोटी खिलाती है। अंत में लज्जित, मौन मुंशी चंद्रिका प्रसाद आते हैं और गर्मी का बहाना कर केवल दो रोटियाँ खाकर गुड़ का पानी पीकर उठ जाते हैं।
माँ का अंतिम त्याग
अब रसोई में केवल सिद्धेश्वरी बचती है; उसके हिस्से में केवल आधी रोटी और थोड़ी दाल बची है। तभी उसे बीमार, भूखे प्रमोद का ध्यान आता है और वह उस आधी रोटी में से भी आधी उसके लिए ढककर रख देती है। बची एक चौथाई सूखी रोटी को वह मुँह में डालकर एक लोटा पानी पी लेती है और भूख शांत करने का प्रयास करती है; फिर दीवार से टेक लगाकर चुपचाप रो पड़ती है। कहानी मध्यमवर्ग के उस यथार्थ को दिखाती है जो भूख की चरम सीमा पर भी परस्पर प्रेम और गरिमा बनाए रखता है।
