एक वृक्ष की हत्या
by कुँवर नारायण
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कुँवर नारायण की यह आधुनिक पर्यावरण-चेतना की कविता वृक्षों की अंधाधुंध कटाई और पर्यावरण संकट पर लिखी गई है। कवि घर लौटने पर देखते हैं कि दरवाजे पर वर्षों से खड़ा पुराना पेड़, जो एक बूढ़े, वफादार चौकीदार जैसा था, काट दिया गया है। पेड़ का सजीव मानवीकरण करते हुए कवि उसे सूखे तने, राइफल-सी टहनी और पत्तों की पगड़ी वाले संतरी के रूप में चित्रित करते हैं। अंत में कवि चेतावनी देते हैं कि पेड़ों की रक्षा वास्तव में नदियों, हवा, घर और मानव-सभ्यता की रक्षा है।
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पेड़ का मानवीकरण
कवि कुछ दिनों बाद अपने पैतृक घर लौटते हैं और पाते हैं कि दरवाजे पर खड़ा पुराना विशाल पेड़ काट दिया गया है। उसके कटने का उन्हें किसी पुराने मित्र की मृत्यु जैसा दुख होता है। वे पेड़ को एक बूढ़े चौकीदार के रूप में चित्रित करते हैं, सूखा झुर्रीदार तना, राइफल-सी तनी सूखी टहनी, सिर पर पत्तों की पगड़ी, जो धूप-ठंड-बरसात में मुस्तैद संतरी की तरह पहरा देता था।
कवि याद करते हैं कि दूर से आने पर पेड़ पूछता था 'कौन?' और वे उत्तर देते 'तुम्हारा दोस्त!', उसकी शीतल छाँव में उन्हें अपूर्व शांति मिलती थी।
पर्यावरण-रक्षा की चेतावनी
कविता के अंत में कवि पूरे विश्व को चेतावनी देते हैं, यदि पेड़ों की कटाई नहीं रुकी तो घर लुटेरों के चंगुल में आ जाएँगे, नदियाँ सूखकर नाला बन जाएँगी, हवा जहरीली होकर धुआँ बन जाएगी और भोजन ज़हर बन जाएगा। पेड़ नष्ट होने पर मनुष्य का स्वभाव भी 'जंगली' हो जाएगा। इसलिए पेड़ों की रक्षा करना ही मानव-सभ्यता की रक्षा है।
