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2nd PUCपद्य / निर्गुण भक्ति (Poetry / Dohe)

कबीर के दोहे

by संत कबीरदास

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ज्ञानमार्गी शाखा के प्रवर्तक संत कबीरदास के ये दोहे बाह्य आडंबरों और पाखंड का खंडन करते हुए अंतःकरण की शुद्धि, आत्म-ज्ञान, मीठी वाणी और आलोचक (निंदक) की उपयोगिता पर बल देते हैं। कबीर कहते हैं कि ईश्वर घट-घट में है, फिर भी अज्ञानी उसे मंदिर-मस्जिद में ढूँढ़ता है, जैसे कस्तूरी-मृग अपनी ही नाभि की सुगंध वन में खोजता है। वे निंदक को पास रखने और अहंकार त्यागकर शीतल, मधुर वाणी बोलने का उपदेश देते हैं।

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अंतःकरण की शुद्धि और आत्म-ज्ञान

कबीर कहते हैं कि जैसे कस्तूरी मृग की अपनी ही नाभि में होती है, पर वह उसकी सुगंध पूरे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है, वैसे ही ईश्वर हर हृदय (घट-घट) में व्याप्त है, पर अज्ञानी मनुष्य उसे मंदिर-मस्जिद में खोजता है। सच्चा ज्ञान बाहर नहीं, भीतर आत्म-शुद्धि में है।

निंदक की उपयोगिता

कबीर लिखते हैं, 'निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।' आलोचना करने वाले को पास रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना पानी और साबुन के, हमारी कमियाँ उजागर करके हमारे स्वभाव को स्वच्छ बना देता है।

मीठी वाणी का महत्व

कबीर कहते हैं, 'ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोए। औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होए।' अहंकार त्यागकर ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जो दूसरों को तो सुख दे ही, स्वयं के मन को भी शांति प्रदान करे।