सुजान भगत
by मुंशी प्रेमचंद
Rapid Learn 2-Minute Revision
Perfect for last-minute revision
2-Minute Revision Video
Video coming soon
प्रेमचंद की यह यथार्थवादी ग्रामीण कहानी दिखाती है कि परिवार में मनुष्य का सम्मान उसके श्रम और वर्तमान उपयोगिता से तय होता है, न कि केवल अतीत की कमाई या धर्म-कर्म से। गौरीपुर का मेहनती किसान सुजान महतो लगातार अच्छी फसलों से संपन्न होकर 'सुजान भगत' बन जाता है और साधु-संतों को दान देने लगता है। उसका बेटा भोला और पत्नी बुलाकी इसे 'अनाज लुटाना' मानकर उसके अधिकार छीन लेते हैं। एक भिक्षुक को दान देते समय भोला उसके हाथ से टोकरी छीन लेता है। अपमानित सुजान अकेले दिन-रात खेतों में कठोर परिश्रम करके सबसे ऊँचा अनाज का ढेर उगाता है और अंत में उसी भिक्षुक को भर-भर टोकरी अनाज देकर अपना खोया हुआ स्वाभिमान वापस पा लेता है।
Detailed Summary
Detailed Summary Video
Video coming soon
सुजान का भगत बनना और संपन्नता
सुजान महतो गौरीपुर गाँव का एक सीधा-सादा, ईमानदार और कठोर परिश्रमी किसान है। लगातार तीन वर्षों तक अच्छी बारिश और उसकी मेहनत के कारण उसके खेतों में सोने जैसी फसलें उगती हैं। उसके घर में दूध-घी की नदियाँ बहने लगती हैं और गाँव के बड़े-बड़े अफसर उसके द्वार पर रुकने लगते हैं।
समृद्धि पाकर सुजान का झुकाव धर्म और अध्यात्म की ओर हो जाता है। वह साधु-संतों का सत्कार करता है, गाँव में पक्का कुआँ खुदवाता है, यज्ञ और ब्रह्मभोज कराता है। इसी परोपकारी आचरण के कारण पूरा गाँव उसे आदर से 'सुजान भगत' कहने लगता है।
परिवार में अनादर और चरम अपमान
भगत बनने के बाद सुजान झूठ और छल-प्रपंच छोड़ देता है और खेती के प्रत्यक्ष प्रबंधन से हट जाता है, जिससे घर का सारा अधिकार बेटे भोला और पत्नी बुलाकी के हाथ में चला जाता है। उसके दान-पुण्य को वे 'अनाज लुटाना' मानने लगते हैं।
एक दिन एक भिक्षुक द्वार पर आता है। सुजान अनाज देने के लिए एक बड़ी टोकरी भरता है, तभी भोला झपटकर उसके हाथ से टोकरी छीन लेता है और कहता है कि यह मुफ्त का माल नहीं है। यह अपमान सुजान के हृदय में तीर की तरह चुभ जाता है और वह स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प लेता है।
कठोर परिश्रम और स्वाभिमान की वापसी
उसी रात सुजान कुदाल-हल लेकर खेतों में चला जाता है और दिन-रात अकेले, बिना थके परिश्रम करता है। उसकी फसल पूरे गाँव में सबसे शानदार होती है और खलिहान में उसके हिस्से का अनाज का ढेर सबसे ऊँचा होता है। यह देखकर भोला और बुलाकी का सिर शर्म से झुक जाता है।
अंत में वही भिक्षुक दोबारा आता है। सुजान स्वयं टोकरी भरकर अनाज उसके सिर पर रखवा देता है और गर्व से भोला-बुलाकी की ओर देखता है। उसने सिद्ध कर दिया कि कर्म और श्रम ही मनुष्य के स्वाभिमान की सच्ची कसौटी हैं।
