चीफ़ की दावत
by भीष्म साहनी
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भीष्म साहनी की यह व्यंग्य कहानी आधुनिक मध्यमवर्गीय परिवारों में बूढ़े माता-पिता के प्रति असंवेदनशीलता और दिखावे पर प्रहार करती है। पदोन्नति की चाह में शामनाथ अपने अमेरिकन चीफ़ को घर पर दावत देता है और अपनी अनपढ़, विधवा बूढ़ी माँ को मेहमानों से छिपाना चाहता है। संयोगवश चीफ़ माँ के सामने आ जाता है, पर उनके सरलपन, लोकगीत और हाथ से बनी 'फुलकारी' से प्रभावित हो जाता है। शामनाथ माँ से एक और फुलकारी बनवाने का वादा कर देता है। कहानी माँ के निस्वार्थ प्रेम और बेटे के क्रूर स्वार्थ के विरोधाभास के साथ समाप्त होती है।
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दावत की तैयारी और माँ की समस्या
शामनाथ अपने दफ्तर के अमेरिकन चीफ़ के स्वागत में भव्य दावत का आयोजन करता है। वह और उसकी पत्नी कीमती पर्दे, कालीन और शराब का इंतजाम करते हैं। उनके सामने सबसे बड़ी 'समस्या' उनकी बूढ़ी, अनपढ़, विधवा माँ है, जिसे वे मेहमानों की नज़रों से छिपाना चाहते हैं ताकि प्रतिष्ठा और पदोन्नति पर आँच न आए।
शामनाथ माँ को निर्देश देता है कि वह पहले ही खाना खा ले, बरामदे में सीधी बैठी रहे, सोए नहीं, और नींद आने पर अपनी कोठरी में चली जाए ताकि उसके खर्राटे मेहमानों तक न पहुँचें। माँ बेटे की तरक्की के लिए सब शर्तें चुपचाप मान लेती है।
चीफ़ का माँ से प्रभावित होना
रात को मेहमानों के गुजरते समय चीफ़ की नज़र कुर्सी पर सोई माँ पर पड़ती है। घबराई माँ बायाँ हाथ बढ़ा देती है; शामनाथ टोकता है। चीफ़ माँ के सीधेपन से प्रभावित होकर उनसे पंजाबी लोकगीत सुनता है और सभी तालियाँ बजाते हैं।
चीफ़ की नज़र माँ के हाथ से बनी पुरानी 'फुलकारी' पर पड़ती है और वह उसकी बारीक कलाकारी से मुग्ध हो जाता है। शामनाथ तुरंत वादा करता है कि माँ चीफ़ के लिए एक नई फुलकारी बनाएगी।
माँ का निस्वार्थ त्याग
मेहमानों के जाने पर शामनाथ नशे में माँ को गले लगाकर कहता है कि उसका प्रमोशन पक्का हो गया। माँ हरिद्वार जाने की इच्छा प्रकट करती है, पर शामनाथ चिढ़कर पूछता है कि तब चीफ़ की फुलकारी कौन बनाएगा। माँ अपने आँसू पोंछकर, अपनी इच्छाओं का गला घोंटते हुए, बेटे के लिए फुलकारी बनाने को तैयार हो जाती है।
