पंद्रह अगस्त
by गिरिजाकुमार माथुर
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कवि कहते हैं कि लंबे संघर्ष और बलिदानों के बाद हमें स्वतंत्रता की सुबह मिली है, इसलिए आज 'जीत की रात' पहरुओं को सावधान रहना होगा। शत्रु पराजित तो हुआ है पर उसकी काली छायाएँ अभी भी हवाओं में हैं। जाति, धर्म और वर्ग का भेद मिटाकर ही स्वतंत्रता अक्षुण्ण रह सकती है।
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सजगता का आह्वान
कवि देश के कर्णधारों, रक्षकों और विशेषकर युवाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि अनगिनत बलिदानों के बाद मिली स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सीमाओं पर कड़ी नजर रखनी होगी, क्योंकि शत्रु की काली छायाएँ अभी भी देश की हवाओं में तैर रही हैं।
वे आंतरिक सुरक्षा, अखंडता और एकता पर बल देते हैं और कहते हैं कि जाति, धर्म व वर्ग के भेद मिटाकर ही स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा जा सकता है। 'पहरुए' से उनका आशय केवल सैनिक नहीं, हर नागरिक है।
