लघुकथाएँ (उषा की दीपावली / मुस्कुराती चोट)
by संतोष सुपेकर / नरेंद्र कोहली
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'उषा की दीपावली' में उषा थाली में ढेर सारा भोजन छोड़ देती है; वही फेंका भोजन एक गरीब कबाड़ी अपनी भूखी नातिन को खिलाता है। यह दृश्य उषा को झकझोर देता है और वह अन्न न बर्बाद करने का संकल्प लेती है। 'मुस्कुराती चोट' में शेखर बबलू को कम पैसे देकर उसकी गरीबी का मज़ाक उड़ाता है, पर बबलू की शांत मुस्कान शेखर के अहंकार पर करारी चोट कर देती है।
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उषा की दीपावली
उषा अपनी थाली में ढेर सारा भोजन छोड़ देती है, जिसे उसकी माँ कचरे में फेंक देती है। खिड़की से उषा देखती है कि एक गरीब कबाड़ी वही फेंका भोजन बड़े चाव से अपनी भूखी नातिन को खिला रहा है। यह दृश्य उसके कोमल मन को झकझोर देता है और वह तय करती है कि अब कभी थाली में अन्न नहीं छोड़ेगी। कहानी अन्न संरक्षण और सामाजिक संवेदनशीलता का संदेश देती है।
मुस्कुराती चोट
शेखर बबलू से जूते पॉलिश करवाता है और गरीबी का मज़ाक उड़ाने के लिए कम पैसे देता है। बबलू बिना शिकायत पैसे ले लेता है, पर उसके चेहरे की 'मुस्कुराहट' शेखर के अहंकार पर करारी 'चोट' जैसी लगती है। शेखर को अपनी संवेदनहीनता का अहसास होता है और वह समझ जाता है कि स्वाभिमान केवल अमीरों की बपौती नहीं है।
