प्रेरणा
by त्रिपुरारि
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त्रिपुरारि जी की 'प्रेरणा' नामक त्रिवेणियों में जीवन के गहन सत्य को सरल भाषा में उकेरा गया है। कवि कहते हैं कि माता-पिता का आशीर्वाद ही वह कवच है जो हर आंधी-तूफान से रक्षा करता है। घर का बुजुर्ग बच्चे का मासूम हाथ थामते ही नई ऊर्जा पा लेता है। रात कितनी भी लंबी हो, सुबह का सूरज अवश्य निकलता है, असफलताओं को नई शुरुआत की 'प्रेरणा' मानना चाहिए।
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त्रिवेणियों का भाव
पहली त्रिवेणी में कवि कहते हैं कि मनुष्य कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले, यदि उसके पास माता-पिता का आशीर्वाद नहीं है तो सारा वैभव व्यर्थ है। यह आशीर्वाद ही दुनिया की हर आंधी और तूफान से रक्षा करने वाला अभेद्य कवच है।
एक अन्य त्रिवेणी में बचपन और बुढ़ापे का अटूट संबंध दर्शाया गया है, थके कदमों से चलता बुजुर्ग बच्चे का हाथ थामते ही नई ऊर्जा पा लेता है। कवि निराशा के बाद आशा की किरण को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि रात कितनी भी अँधेरी हो, सुबह अवश्य आती है।
काव्यगत शिल्प
त्रिवेणी विधा की विशेषता यह है कि इसकी तीसरी पंक्ति पहली दो पंक्तियों के रहस्य को चमत्कारी ढंग से खोलती है और विचार को नया आयाम देती है। त्रिपुरारि जी की भाषा सरल, सुबोध और प्रभावोत्पादक है।
