सहर्ष स्वीकारा है
by गजानन माधव 'मुक्तिबोध'
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कवि अपने जीवन की हर परिस्थिति, गरीबी, संघर्ष, दुख, को सहर्ष स्वीकार करते हैं क्योंकि उनके जीवन का सब कुछ उस अज्ञात परम सत्ता (प्रेमिका/माँ/ईश्वर) को प्रिय है। पर वे यह भी मानते हैं कि अत्यधिक ममता आत्मबल को कमजोर करती है, इसलिए कुछ समय वियोग का अँधेरा सहकर आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं।
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स्वीकार्यता व आत्मनिर्भरता का द्वंद्व
कवि कहते हैं कि मेरी 'गरबीली गरीबी', विचार, अनुभव व भावनाएँ, सब मैंने सहर्ष स्वीकार किए हैं, क्योंकि इसके पीछे तुम्हारा (परम सत्ता का) अगाध प्रेम है। मेरे जीवन का हर रूप तुम्हारे प्रेम की छाया से आलोकित है।
आगे वे मनोवैज्ञानिक द्वंद्व प्रकट करते हैं, अत्यधिक ममता आत्मबल कमजोर करती है, इसलिए वे प्रार्थना करते हैं कि कुछ समय अँधेरी गुफाओं में खो जाने दो ताकि संघर्ष करना सीखूँ व आत्मनिर्भर बनूँ। यह वियोग प्रेम को और गहरा बनाता है।
