भारती का सपूत
by रांगेय राघव
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रांगेय राघव के उपन्यास का यह अंश भारतेंदु हरिश्चंद्र के त्यागमयी व प्रेरणादायी जीवन को दर्शाता है। भारतेंदु ने कुल के झूठे गौरव के बजाय देश की भाषा व सम्मान को सर्वोपरि माना; अपनी पैतृक संपत्ति हिंदी के विकास व देश-कल्याण में दान कर दी, इसलिए 'औढरदानी' कहलाए।
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भारतेंदु का समर्पण
भारतेंदु बचपन से कुशाग्र व संवेदनशील थे; उनके पिता गोपालचंद्र भी लेखक थे। मिशनरी स्कूलों में बच्चों को अपनी संस्कृति-भाषा से दूर करने के षड्यंत्र के विरुद्ध उन्होंने आवाज़ उठाई और घर पर हिंदी-अंग्रेजी की निःशुल्क पाठशाला खोली।
उन्होंने पैतृक संपत्ति का बड़ा हिस्सा हिंदी भाषा के विकास व साहित्यकारों की मदद में दान कर दिया। 'निज भाषा की उन्नति ही देश के विकास का मूल आधार है', यह उनका अटूट विश्वास था।
