Class 12पद्य / प्रगतिशील कविता (Poem / Progressive)
सच हम नहीं; सच तुम नहीं
by जगदीश गुप्त
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कवि कहते हैं कि जीवन में न मैं पूरी तरह सच हूँ, न तुम; असली सच वह 'संघर्ष' है जो हम रोज करते हैं। जो संघर्ष से डरकर रोने लगता है, वह कभी प्रगति नहीं कर सकता। जीवन-पथ पर आगे बढ़ने के लिए काँटों और कठिनाइयों को पार करना ही होगा।
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संघर्ष ही जीवन का सच
यह कविता जीवन के यथार्थवादी संघर्ष को बयां करती है। जीवन स्थिरता का नाम नहीं; उतार-चढ़ाव, बाधाएँ व चुनौतियाँ ही जीवन की गतिशीलता बनाए रखती हैं। जो संघर्ष से भागता है वह मृतप्राय हो जाता है, इसलिए संघर्ष ही वास्तविक सत्य है। कवि युवाओं को असफलताओं से निराश न होकर हर परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने की प्रेरणा देते हैं।
