आह्वान
by मैथिलीशरण गुप्त
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'आह्वान' राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की एक ओजस्वी प्रेरणा-कविता है, जो लगभग सन् 1912 में, गुलाम भारत में लिखी गई थी। उस समय अंग्रेज़ी दमन और बेरोज़गारी से जनता निराश और भाग्यवादी होती जा रही थी। कवि देशवासियों को झकझोरते हुए कहते हैं, 'बैठे हुए हो व्यर्थ क्यों? आगे बढ़ो, ऊँचे चढ़ो!' भाग्य के भरोसे बैठना छोड़कर पुरुषार्थ (कर्म) का पाठ पढ़ो, क्योंकि सामने रखा निवाला भी स्वयं मुँह में नहीं जाता, हर सफलता के लिए परिश्रम करना पड़ता है। कवि कहते हैं कि जो लोग कभी तुमसे पीछे थे, वे आगे बढ़ गए, और तुम पिछड़कर अपना दोष 'दैव' (भाग्य) के सिर मढ़ रहे हो; पर कर्मरूपी तेल के बिना भाग्यरूपी दीपक कभी नहीं जलता और साँचे के बिना कुछ भी नहीं ढलता। अंत में कवि सांप्रदायिक भेदभाव भुलाकर एकता का आह्वान करते हैं, सभी देशवासी प्रेम से देश की एक माला के फूल बन जाएँ और सुख-शांतिमय लक्ष्य के साधक बनें; जैसे भाँति-भाँति के फूलों से एक सुंदर माला बनती है, वैसे ही विविधता में एकता संभव है।
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भाग्यवाद छोड़ो, पुरुषार्थ करो
कवि देशवासियों को पुकारते हैं कि व्यर्थ निराश होकर मत बैठो, उठो, आगे बढ़ो और ऊँचाई छूने का प्रयास करो। भाग्य के भरोसे बैठने के बजाय पौरुष और कर्म का पाठ पढ़ो। वे उदाहरण देते हैं कि सामने रखा निवाला भी अपने-आप मुँह में नहीं जाता; उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाना पड़ता है, इसी तरह हर उपलब्धि के लिए उद्यम आवश्यक है।
दैव नहीं, कर्म ही आधार
कवि कहते हैं कि जो लोग कभी पीछे थे, वे परिश्रम से आगे बढ़ गए, जबकि तुम पिछड़कर अपनी असफलता का दोष भाग्य पर डाल रहे हो। कर्मरूपी तेल के बिना भाग्यरूपी दीपक नहीं जल सकता और साँचे के बिना कोई आकृति नहीं ढलती, अर्थात् बिना कर्म के भाग्य भी कुछ नहीं कर सकता।
एकता का आह्वान
कवि सभी देशवासियों से आग्रह करते हैं कि वे प्रेमपूर्वक एकजुट होकर देश की माला के फूल बन जाएँ और सुख-शांतिमय उद्देश्य के साधक बनें। वे प्रश्न करते हैं कि क्या सांप्रदायिक भेद से एकता मिट सकती है? जैसे अनेक प्रकार के फूलों से एक ही सुंदर माला बनती है, वैसे ही विविधता के बीच राष्ट्रीय एकता संभव है।
