राबर्ट नर्सिंग होम में
by कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'
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'राबर्ट नर्सिंग होम में' कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' का एक हृदयस्पर्शी रेखाचित्र (रिपोर्ताज) है, जिसमें नि:स्वार्थ सेवा की महिमा उजागर की गई है। सितंबर 1951 में लेखक की आतिथेया अचानक बीमार पड़ जाती हैं और उन्हें इंदौर के राबर्ट नर्सिंग होम में भर्ती कराना पड़ता है; कल तक जो अतिथि था, वह आज परिचारक बन जाता है। वहाँ लेखक की भेंट सेवा में तल्लीन तीन विभूतियों से होती है, होम की अध्यक्षा फ्रांस की मदर टेरेसा, जर्मनी की युवा सेविका सिस्टर क्रिस्ट हैल्ड, और चालीस वर्षों से सेवारत सबसे बूढ़ी मदर मार्गरेट। धवल वेश में आई मदर टेरेसा के आते ही रोगी के मुरझाए चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है, डॉक्टर कहता है, 'तुम हँसी बिखेरती हो, इसलिए बीमार हँस रहा है।' पैंतालीस वर्ष की मदर टेरेसा मात्र तीस रुपये मासिक पर बीस वर्षों से रोगियों की सेवा में लगी हैं। लेखक जब जाति, देश और युद्ध की दीवारें खड़ी करने की कोशिश करता है, 'फ्रांस को हिटलर ने पददलित किया था', तो मदर उत्तर देती हैं, 'हिटलर बुरा था, पर उससे इस लड़की का भी घर ढहा और मेरा भी; हम दोनों एक।' क्रिस्ट हैल्ड के पिता जर्मनी में एक कॉलेज के प्रिंसिपल हैं और उसने पाँच वर्ष के लिए सेवा का व्रत लिया है। मदर टेरेसा घर से आने के बाद फिर घर नहीं गईं, एक बार माताएँ जहाज़ पर बेटियों को लेने आईं पर बरसों की सेवा ने उन्हें इतना बदल दिया था कि वे एक-दूसरे को पहचान तक न सकीं। जब कोई रोगी 'आज मेरे लिए प्रार्थना करना' कहता है तो मदर कहती हैं, 'नहीं, कल उसके लिए करूँगी, जिसे सबसे अधिक कष्ट होगा।' पाठ यह सिखाता है कि सच्ची सेवा जाति, धर्म, देश और भाषा की सारी दीवारों को तोड़ देती है, और जो जितनी अधिक सेवा में डूबा है, वह उतना ही अधिक प्रसन्न और उत्फुल्ल है।
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मदर टेरेसा, हँसी बिखेरती सेवा
बीमार आतिथेया को इंदौर के राबर्ट नर्सिंग होम में भर्ती कराने पर लेखक की भेंट होम की अध्यक्षा मदर टेरेसा से होती है। पैंतालीस वर्ष की, हिम-श्वेत वर्ण वाली यह नारी आते ही कहती है, 'बीमार के पास लंबा (उदास) मुँह अच्छा नहीं लगता।' उनके हाथ फेरते ही रोगी के सूखे होंठों पर मुस्कान खिल जाती है। तीस रुपये मासिक पर बीस वर्षों से सेवारत यह स्त्री बिना प्रसव किए ही सबकी 'माँ' बन गई है।
दीवारें तोड़ती सेवा, 'हम दोनों एक'
लेखक जब जाति और युद्ध की दीवारें खड़ी करना चाहता है, कि जर्मन क्रिस्ट हैल्ड के हिटलर ने फ्रांस को पददलित किया, तो मदर टेरेसा शांत भाव से कहती हैं कि हिटलर की छेड़ी लड़ाई से इस लड़की का भी घर ढहा और मेरा भी, इसलिए 'हम दोनों एक।' लेखक सोचता रह जाता है कि मनुष्य ने ही मनुष्य के बीच जाति, वर्ग और भूगोल की कितनी मनहूस दीवारें खड़ी की हैं।
त्याग का सौम्य स्वरूप और उत्फुल्ल वृद्धाएँ
क्रिस्ट हैल्ड ने पाँच वर्ष के लिए सेवा-व्रत लिया है; घर से चलते समय वह नहीं, उसकी माँ रोई थी। मदर टेरेसा घर से आने के बाद फिर घर नहीं गईं, सेवा ने उन्हें इतना बदल दिया कि उनकी माँ उन्हें पहचान न सकीं। जब रोगी प्रार्थना माँगता है तो मदर कहती हैं, 'कल उसके लिए, जिसे सबसे अधिक कष्ट होगा।' चालीस वर्षों से सेवारत बूढ़ी मदर मार्गरेट सबसे अधिक हँसमुख और फुर्तीली हैं। लेखक अनुभव करता है कि सेवा-निरत, लक्ष्यदर्शी जीवन की यह जोत विश्व की सर्वोत्तम जोत है।
