पढ़ें कैसे
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'पढ़ें कैसे' एक कौशल-आधारित पाठ है, जो 'समझकर पढ़ने' (सार्थक पठन) के कौशल और उसके पाँच चरणों को सिखाता है। पाठ बताता है कि केवल अक्षर या शब्द पहचान लेना पढ़ना नहीं है; सच्चा पढ़ना तब होता है जब हम पढ़ी हुई बात को समझें, उसमें निहित तथ्यों-घटनाओं का पारस्परिक संबंध जानें और उसका मूल्यांकन कर आनंद लें। पढ़ने के पाँच चरण हैं, (1) अक्षरों तथा उनसे बने शब्दों की पहचान; (2) शब्दों के अर्थ जानना (जैसे 'ईख' और 'कमल' का चित्र देखकर उनका मूर्त रूप और अर्थ समझ में आना); (3) उचित/तीव्र गति से मौन वाचन, धीरे-धीरे, अटक-अटककर या होंठ हिलाकर पढ़ने से अर्थ पकड़ में नहीं आता; (4) पढ़ते-पढ़ते प्रसंग के अनुसार अर्थ समझते चलना और तथ्यों-घटनाओं का पूर्वापर तथा कार्य-कारण संबंध जोड़ना (जैसे 'बादल बरसना' और 'माँ का बरसना' का भिन्न अर्थ); और (5) पढ़ी हुई सामग्री से निष्कर्ष निकालना, मूल्यांकन करना, निहित (छिपे हुए) भाव ग्रहण करना और आनंद लेना। इन सभी चरणों को साधने पर ही व्यक्ति सचमुच 'पढ़ना' सीखता है।
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पहचान से अर्थ तक
पढ़ने का पहला चरण है भाषा के अक्षरों और उनसे बने शब्दों की पहचान। पर केवल शब्द पढ़ लेना पर्याप्त नहीं; दूसरा चरण है शब्दों के अर्थ जानना। यदि बच्चे ने शब्द कभी सुना न हो तो वह पढ़ तो लेता है पर अर्थ नहीं समझता, इसीलिए 'ईख' और 'कमल' के साथ चित्र देकर उनका मूर्त रूप और अर्थ स्पष्ट किया जाता है, जिससे शब्द सार्थक हो जाते हैं।
गति और समझ
तीसरा चरण है उचित गति से पढ़ना। धीरे-धीरे, रुक-रुककर या होंठ हिलाकर पढ़ने से पूरे अनुच्छेद का अर्थ पकड़ में नहीं आता; अतः समुचित गति से मौन वाचन का अभ्यास करना चाहिए। चौथा चरण है पढ़ते-पढ़ते प्रसंग के अनुसार अर्थ समझते चलना और बातों-घटनाओं का आपसी तथा कार्य-कारण संबंध जोड़ना, जैसे एक ही शब्द 'बरसना' बादलों के संदर्भ में 'पानी गिरना' और माँ के संदर्भ में 'डाँटना' है।
मूल्यांकन, निहित भाव और आनंद
पाँचवाँ और अंतिम चरण है पढ़ी हुई सामग्री से निष्कर्ष निकालना, अपने पूर्व-ज्ञान के आधार पर उसका मूल्यांकन करना, रचना में जो बातें साफ़-साफ़ नहीं कही गईं पर छिपी (निहित) हैं उन्हें भी ग्रहण करना और पढ़ने का आनंद लेना। जब पाठक इन पाँचों चरणों को साध लेता है, तभी वह सचमुच 'पढ़ना' सीखता है और पढ़ी हुई बात को अपने ज्ञान व अनुभव का हिस्सा बना लेता है।
