खून का रिश्ता
by भीष्म साहनी
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'खून का रिश्ता' भीष्म साहनी की एक मार्मिक यथार्थवादी कहानी है, जो मध्यमवर्गीय समाज में धन और झूठी प्रतिष्ठा के कारण पारिवारिक रिश्तों के खोखलेपन को उजागर करती है। वीरजी की सादगी-भरी सगाई में गरीब चाचा मंगलसेन को प्रतिष्ठा के भय से नहीं ले जाया जाता। सगाई में लड़की वालों के यहाँ से चांदी की एक चम्मच गायब होने पर बिना सबूत सबसे पहले गरीब चाचा पर ही चोरी का आरोप लगता है; पर अंत में दुल्हन का भाई चम्मच लौटाता है, जिससे परिवार की संकीर्ण मानसिकता बेनकाब हो जाती है।
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कहानी वीरजी की सगाई की तैयारियों से आरंभ होती है। प्रगतिशील वीरजी के आग्रह पर सगाई 'सवा रुपये' की सादगी से तय होती है, पर उनके माता-पिता (बाबूजी और माँजी) अपनी रईसी दिखाना चाहते हैं। परिवार में वीरजी के गरीब चचेरे चाचा मंगलसेन भी रहते हैं, जो पूरी तरह वीरजी के पिता पर निर्भर हैं और घरेलू काम करके भी अपमानजनक शब्द ही पाते हैं।
अपमान और आरोप
सगाई के दिन चाचा मंगलसेन सज-धजकर तैयार होते हैं, पर बाबूजी-माँजी अपनी झूठी प्रतिष्ठा के भय से उन्हें घर पर ही रोक देते हैं। सगाई के दौरान लड़की वालों के यहाँ से चांदी की एक कीमती चम्मच गायब हो जाती है। घर लौटने पर बाबूजी का शक तुरंत सबसे कमजोर और गरीब चाचा मंगलसेन पर जाता है; वे उन पर चिल्लाते हैं, उनकी जेबों की तलाशी लेते हैं और पुलिस की धमकी देते हैं। चाचा रोते हुए अपने निर्दोष होने की दुहाई देते हैं।
सच्चाई का उद्घाटन
तभी दुल्हन प्रभा का छोटा भाई वह चम्मच लौटाने आता है और बताता है कि विदाई के समय वह गलती से उनके बर्तनों के डिब्बे में पैक हो गई थी। यह सुनते ही पूरे घर में सन्नाटा छा जाता है और बाबूजी-माँजी का झूठा अहंकार बेनकाब हो जाता है। जिस 'खून के रिश्ते' को केवल गरीबी के कारण चोर समझा गया, वह पूर्णतः निर्दोष सिद्ध होता है; कहानी आत्मग्लानि और मौन शर्मिंदगी के साथ समाप्त होती है।
