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1st PUCअपठित / दार्शनिक कहानीसाहित्य वैभव, अपठित भाग

श्मशान

by मन्नू भंडारी

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'श्मशान' मन्नू भंडारी की एक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक कहानी है, जो प्रेम की नश्वरता, मानवीय स्वार्थ और समय के साथ बदलती भावनाओं पर तीखा प्रहार करती है। एक युवक बारी-बारी से अपनी तीन पत्नियों की मृत्यु पर श्मशान में आकर हर बार यही दावा करता है कि उसका 'सच्चा प्रेम' तो इसी से था। श्मशान का मानवीय प्रेम पर से विश्वास उठ जाता है, पर पास खड़ी पहाड़ी उसे समझाती है कि मनुष्य प्रेम से अधिक अपने जीवन और जीने की ललक से प्रेम करता है।

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कहानी नदी-किनारे के श्मशान घाट से आरंभ होती है, जिसके समीप एक विशाल, शांत पहाड़ी खड़ी है। दोनों के बीच प्रायः मूक बातचीत होती है। श्मशान सदियों से मनुष्यों को जलते और रिश्तेदारों को रोते देखता आया है, अतः उसके मन में मानव के 'अमर प्रेम' की ऊँची धारणा है।

तीन पत्नियाँ, तीन विलाप

एक शाम एक सुंदर युवक अपनी पत्नी सुकेशी के शव के साथ आता है और उसकी राख पर फूट-फूटकर रोता है, 'मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता।' श्मशान को लगता है उसने सच्चे अमर प्रेम के दर्शन कर लिए। तीन वर्ष बाद वही युवक अपनी दूसरी पत्नी के शव के साथ आता है और कहता है कि सुकेशी तो केवल 'अनुगामिनी' थी, सच्चा प्रेम तो 'सहगामिनी' से था। दो वर्ष बाद वह तीसरी पत्नी के शव के साथ आता है और उसे 'अग्रगामिनी' कहकर उसी को अपना अंतिम-सच्चा प्रेम बताता है।

पहाड़ी का दर्शन

युवक की चंचलता देखकर श्मशान का मानव-प्रेम पर से विश्वास उठ जाता है और वह उसे स्वार्थी-ढोंगी समझता है। तब पहाड़ी मुस्कुराकर समझाती है, 'यह ढोंग नहीं, मनुष्य की जीने की ललक (Lust for Life) है। वह वियोग के चरम दुख को भी समय के साथ सह लेता है क्योंकि उसे जीना प्यारा है; इसीलिए उसका हर विलाप उस क्षण के लिए सच्चा होता है।' यह सुनकर श्मशान को जीवन-मृत्यु के शाश्वत नियम का गहरा बोध होता है।