शीत लहर
by डॉ. जयप्रकाश कर्दम
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'शीत लहर' डॉ. जयप्रकाश कर्दम की एक मार्मिक समसामयिक कहानी है, जो महानगरों के संभ्रांत वर्ग की संवेदनहीनता, बेघरों के प्रति दोहरे रवैये और भौतिक संपदा के अंधे मोह को उजागर करती है। दिल्ली की भीषण शीत लहर में रिटायर्ड अधिकारी चंद्रप्रकाश का द्वारका वाला आलीशान फ्लैट खाली पड़ा है। उनकी दयालु पत्नी पूनम बेघरों को उसमें रात-भर शरण देने का मानवीय प्रस्ताव रखती है, पर चंद्रप्रकाश और सोसाइटी सेक्रेटरी सुरक्षा और प्रतिष्ठा का बहाना बनाकर उसे ठुकरा देते हैं।
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कहानी दिल्ली की जानलेवा जनवरी की ठंड से आरंभ होती है, जब पूरा उत्तर भारत शीत लहर की चपेट में है और सड़कों पर बेघर, मजदूर व बच्चे बिना गर्म कपड़ों के ठिठुर रहे हैं। मुख्य पात्र चंद्रप्रकाश एक रिटायर्ड प्रथम श्रेणी अधिकारी हैं जिन्होंने द्वारका की कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में एक आलीशान फ्लैट खरीदा है, जो अभी खाली पड़ा है।
पूनम का मानवीय प्रस्ताव
रविवार को फ्लैट देखने जाते समय पूनम लाल बत्ती पर ठंड से नीले पड़े बच्चों-औरतों को देखकर व्याकुल हो उठती है। वह चंद्रप्रकाश से अनुरोध करती है कि जब तक भीषण ठंड है, बेघरों को उनके खाली फ्लैट या बेसमेंट में रात बिताने की अनुमति दे दी जाए ताकि उनके प्राण बच सकें।
संवेदनहीनता का पर्दाफाश
यह सुनते ही चंद्रप्रकाश भड़क उठते हैं, 'यह धर्मशाला नहीं, वी.आई.पी. सोसाइटी है; ये गंदगी फैलाएंगे और फ्लैट खाली नहीं करेंगे।' सोसाइटी सेक्रेटरी भी नियमों और प्रतिष्ठा का बहाना बनाकर प्रस्ताव ठुकरा देता है। शाम को लौटते समय पूनम फिर वही ठिठुरते बच्चे देखती है और उसकी आँखों में बेबसी के आँसू आ जाते हैं; वह समझ जाती है कि यह 'शीत लहर' केवल मौसम की नहीं, मनुष्य के जमे हुए हृदय की भी है।
