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1st PUCअपठित / यथार्थवादी कहानीसाहित्य वैभव, अपठित भाग

मधुआ

by जयशंकर प्रसाद

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'मधुआ' छायावाद के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद की एक संवेदनशील सामाजिक कहानी है, जो दर्शाती है कि प्रेम और उत्तरदायित्व की भावना किस प्रकार एक भटके हुए, नशे में डूबे व्यक्ति का कायाकल्प कर सकती है। एक नामहीन शराबी क्रूर जमींदार ठाकुर सरदार सिंह को कहानियाँ सुनाकर शराब के पैसे कमाता है, पर जब वह अनाथ, भूखे और प्रताड़ित बालक मधुआ से मिलता है तो उसका सोया हुआ पितृत्व जाग उठता है; वह शराब सदा के लिए त्यागकर मधुआ के भरण-पोषण के लिए ईमानदारी से मेहनत करने का संकल्प लेता है।

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कहानी का मुख्य पात्र एक नामहीन शराबी है जो वर्षों से बिना किसी उद्देश्य के जी रहा है। वह गौरीपुर के क्रूर जमींदार ठाकुर सरदार सिंह को अपनी लच्छेदार, काल्पनिक कहानियाँ सुनाकर रिझाता है और बदले में मिले पैसों से शराब पीकर नाली में पड़ा रहता है। शराब ही उसका एकमात्र सहारा बन चुकी है।

मधुआ से भेंट

एक शाम ठाकुर साहब की महफिल में कहानियाँ सुनाकर वह एक रुपया पाता है। लौटते समय उसे रसोई के बाहर फटे कपड़ों में लिपटे एक बालक की सिसकियाँ सुनाई देती हैं, यह अनाथ मधुआ है, जो बर्तन मांजने का काम करता है, दो दिन से भूखा है और कारिंदे द्वारा कोड़े से पीटा गया है। उसकी दयनीय दशा और कोड़ों के नीले निशान देखकर शराबी का हृदय काँप उठता है और वह मधुआ को अपनी कोठरी ले आता है।

हृदय-परिवर्तन

उस एक रुपये से वह शराब के बजाय मधुआ के लिए गरम पराठे, आलू-मटर की सब्जी और मिठाई खरीद लाता है और उसे भरपेट खिलाता है। रात मधुआ उसकी छाती से चिपककर सो जाता है। अगली सुबह उसे अहसास होता है कि अब वह अकेला नहीं है; उसके भीतर का पिता और मनुष्य जाग उठता है। वह प्रतिज्ञा करता है कि अब कभी शराब को नहीं छुएगा। वह वर्षों से पड़ी अपनी सान धरने की मशीन (पहिया) निकालता है और मधुआ से कहता है, 'चलो मधुआ, अब हम दोनों मिलकर ईमानदारी की रोटी खाएंगे।' प्रेम ने एक शराबी को कर्मठ, स्वाभिमानी नागरिक बना दिया।