मेरी बद्रीनाथ यात्रा
by विष्णु प्रभाकर
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'मेरी बद्रीनाथ यात्रा' विष्णु प्रभाकर का जीवंत यात्रा-वृत्तांत है, जो हिमालय की अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता और भारत की सांस्कृतिक-धार्मिक अखंडता का चित्रण करता है। लेखक ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, पीपलकोटी, जोशीमठ और पांडुकेश्वर होते हुए अलकनंदा के तट पर, नर-नारायण पर्वतों के बीच बसे बद्रीनाथ धाम पहुँचते हैं। बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी और इसके मुख्य पुजारी (रावल) केरल के नंबूदिरी ब्राह्मण होते हैं, जो उत्तर-दक्षिण की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।
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लेखक सितंबर-अक्टूबर में अपने साथियों के साथ ऋषिकेश से बस द्वारा यात्रा आरंभ करते हैं। मार्ग घुमावदार और दुर्गम है; अलकनंदा नदी साथ-साथ बहती है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का पवित्र संगम होता है, फिर श्रीनगर, पीपलकोटी और जोशीमठ आते हैं। जोशीमठ में आदि शंकराचार्य ने शहतूत के वृक्ष के नीचे तपस्या कर उपनिषदों पर टीकाएँ लिखी थीं।
प्राकृतिक सौंदर्य
ऊँचाई बढ़ने पर प्रकृति और मनोरम होती जाती है। लेखक देवदारू (Deodar) के घने जंगलों और भोजपत्र (Bhojpatra) के पवित्र वृक्षों का वर्णन करते हैं, भोजपत्र वही ऐतिहासिक वृक्ष है जिसकी छाल पर प्राचीन ऋषियों ने वेद-शास्त्र लिखे थे। पांडुकेश्वर का संबंध पांडवों के पिता राजा पांडु से माना जाता है।
बद्रीनाथ धाम और सांस्कृतिक एकता
बद्रीनाथ धाम अलकनंदा के दाहिने तट पर, नर और नारायण नामक दो पर्वतों के बीच स्थित है। मंदिर के पास 'तप्त कुंड' है जिसमें प्राकृतिक रूप से गर्म पानी बहता है, जहाँ यात्री बर्फीली ठंड में स्नान करते हैं। मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी, और इसके मुख्य पुजारी (रावल) दक्षिण भारत के केरल राज्य के नंबूदिरी ब्राह्मण होते हैं, यह व्यवस्था सिद्ध करती है कि उत्तर और दक्षिण भारत आध्यात्मिक-सांस्कृतिक रूप से एक हैं।
