नालायक
by विवेकी राय
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'नालायक' विवेकी राय की एक यथार्थवादी कहानी है जो देश की दूषित शिक्षा प्रणाली, बेरोजगारी और परीक्षा के अंकों से प्रतिभा मापने की संकीर्ण मानसिकता पर करारा प्रहार करती है। जिला परिषद में प्राथमिक शिक्षकों के केवल तीन सौ पदों के लिए दस हजार से अधिक बेरोजगार युवक उमड़ते हैं। एक 'थर्ड डिवीजन' पास युवक को चेयरमैन 'नालायक' कहकर भगा देता है, जिसके बाद वह सभी थर्ड डिवीजन पास साथियों को संगठित कर व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन का बिगुल फूँकता है।
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कहानी कड़कड़ाती ठंड में जिला परिषद कार्यालय के बाहर उमड़ी हजारों बेरोजगार युवकों की भीड़ से आरंभ होती है। प्राथमिक विद्यालयों में अप्रशिक्षित शिक्षकों के केवल तीन सौ पद हैं, पर आवेदक दस हजार से अधिक हैं। सिफारिश करने वाले नेताओं और रसूखदारों की लंबी कतारें लगी हैं; दृश्य किसी मेले जैसा है।
'नालायक' का अपमान
जब एक गरीब, स्वाभिमानी युवक पैरवी लेकर चेयरमैन के पास जाता है, तो वह उसका आवेदन देखकर उपेक्षा से कहता है, 'यहाँ फर्स्ट और सेकंड डिवीजन वाले धक्के खा रहे हैं, तुम्हारे जैसे थर्ड डिवीजन नालायक के लिए कोई जगह नहीं।' यह शब्द युवक के हृदय को तीर की तरह चुभ जाता है और वह सोचता है कि क्या परीक्षा के चंद अंक ही किसी मनुष्य की संपूर्ण योग्यता का पैमाना हैं।
संगठित विद्रोह
आक्रोश से भरा युवक बाहर आकर सभी थर्ड डिवीजन पास युवाओं को इकट्ठा करता है और उनमें स्वाभिमान की ज्वाला भड़काता है। वे संगठित होकर जुलूस निकालते हैं और नारा लगाते हैं, 'किसको मिले मास्टरी चांस, थर्ड डिवीजन मैट्रिक पास!' कहानी संदेश देती है कि प्रतिभा को केवल अंकों और कागजी डिग्रियों से नहीं मापा जा सकता; व्यवस्था को सबको समान अवसर देने चाहिए।
