राष्ट्र का स्वरूप
by डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल
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'राष्ट्र का स्वरूप' डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का एक गंभीर वैचारिक-दार्शनिक निबंध है, जो स्पष्ट करता है कि राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीतिक सीमाओं से नहीं, बल्कि तीन अनिवार्य तत्वों, भूमि, जन और संस्कृति, के समन्वय से होता है। भूमि राष्ट्र का भौतिक आधार (वसुंधरा) है, जन उसके सच्चे पुत्र हैं जिनका भूमि से माता-पुत्र का संबंध है ('माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'), और संस्कृति राष्ट्र का 'मस्तिष्क' है।
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भूमि
भूमि राष्ट्र का पहला और भौतिक आधार है। पृथ्वी की कोख में अमूल्य खनिज और निधियाँ भरी हैं, इसीलिए इसे 'वसुंधरा' कहा जाता है। हमें अपनी धरती के भौगोलिक और प्राकृतिक स्वरूप, उसकी सुंदरता और समृद्धि के प्रति सचेत रहना चाहिए; भूमि से संबंध जितना सुदृढ़ होगा, राष्ट्रीयता की भावना उतनी ही प्रबल होगी।
जन
राष्ट्र का दूसरा अनिवार्य अंग जन (मनुष्य) है। केवल भूमि हो और उस पर रहने वाले लोग न हों तो राष्ट्र की कल्पना असंभव है। पृथ्वी माता है और जन उसका सच्चा पुत्र, उपनिषद का वाक्य है 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः'। जब तक नागरिकों के हृदय में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा नहीं होगी, सशक्त राष्ट्र नहीं बन सकता।
संस्कृति
राष्ट्र का तीसरा अंग संस्कृति है, मनुष्यों द्वारा युगों में विकसित ज्ञान, कला, साहित्य और आध्यात्मिक मूल्य। संस्कृति को राष्ट्र का 'मस्तिष्क' कहा गया है; जैसे मस्तिष्क के बिना शरीर निष्प्राण है, वैसे संस्कृति के बिना राष्ट्र की कल्पना नहीं। हमें अपने पूर्वजों के ज्ञान और चरित्र का आदर करते हुए उसे सहर्ष अपनाना चाहिए। इन तीनों अंगों के समन्वय से ही समृद्ध राष्ट्र का उदय होता है।
