निंदा रस
by हरिशंकर परसाई
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'निंदा रस' व्यंग्य सम्राट हरिशंकर परसाई का एक उत्कृष्ट हास्य-व्यंग्य निबंध है, जो समाज में व्याप्त परनिंदा (पीठ पीछे बुराई) की प्रवृत्ति पर करारा प्रहार करता है। लेखक अपने मित्र 'क' के माध्यम से दिखाते हैं कि निंदा वास्तव में हीनता और कमजोरी (Inferiority Complex) से उत्पन्न होती है, निंदक ईर्ष्यावश दूसरों की लकीर छोटी कर अपनी बड़ी दिखाना चाहता है। लेखक निंदकों की तुलना 'निस्वार्थ मिशनरियों' से करते हैं और आलिंगन की तुलना 'धृतराष्ट्र की पकड़' से।
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निबंध की शुरुआत लेखक के मित्र 'क' के आगमन से होती है, जो कई महीनों बाद कमरे में 'साइक्लोन' की तरह घुसता है और लेखक को अत्यंत आत्मीयता से गले लगाता है। परसाई जी इस आलिंगन की तुलना 'धृतराष्ट्र की पकड़' से करते हैं, जैसे धृतराष्ट्र ने भीम के लोहे के पुतले को गले लगाकर चूर कर दिया था, वैसे ही निंदक ऊपर से प्रेम दिखाते हैं पर भीतर निंदा की आग जलती है।
निंदा का मनोविज्ञान
'क' बैठते ही अपने मित्र 'ग' की घोर निंदा शुरू कर देता है, मानो वह संसार का सबसे घटिया इंसान हो; उसके पास सबके अवगुणों का पूरा 'कैटलॉग' तैयार रहता है। परसाई जी बताते हैं कि निंदा का मूल कारण मनुष्य की हीनता और कमजोरी है, जो व्यक्ति स्वयं कुछ रचनात्मक नहीं कर पाता, वह दूसरों को नीचा दिखाकर अपने दमित अहंकार को संतुष्ट करता है।
निंदक : निस्वार्थ मिशनरी
लेखक हास्यपूर्ण ढंग से निंदकों की तुलना 'निस्वार्थ मिशनरियों' से करते हैं, जो बिना किसी वेतन या निजी बैर के चौबीसों घंटे दूसरों के दोष ढूँढ़ने का कठिन कार्य करते हैं। निंदा ईर्ष्यालुओं के लिए एक 'टॉनिक' है; दिनभर बुराई करने के बाद वे रात को सुकून की नींद सोते हैं। कबीरदास ने भी ऐसे निंदकों को पास रखने की सलाह दी थी, 'निंदक नियरे राखिए।'
