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2nd PUCगद्य / व्यंग्य कहानी (Prose / Satire)

भोलाराम का जीव

by हरिशंकर परसाई

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हरिशंकर परसाई का यह तीखा राजनीतिक व्यंग्य सरकारी दफ्तरों की भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और लालफीताशाही को उजागर करता है। जबलपुर के गरीब सेवानिवृत्त कर्मचारी भोलाराम की मृत्यु के बाद उसका जीव यमदूत के हाथ से गायब हो जाता है। नारद मुनि उसे खोजने पृथ्वी पर आते हैं और पेंशन दफ्तर पहुँचते हैं, जहाँ रिश्वत के बिना कोई काम नहीं होता। साहब नारद की वीणा रिश्वत में लेकर भोलाराम की फाइल मँगवाते हैं। जब साहब 'भोलाराम' पुकारते हैं, तो फाइल में से भोलाराम के जीव की आवाज़ आती है, उसका मन पेंशन की फाइल में ही अटका हुआ है।

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यमलोक में भोलाराम के जीव का लापता होना

यमलोक में खलबली है, जबलपुर के गरीब कर्मचारी भोलाराम का जीव यमदूत के हाथ से छूटकर गायब हो गया है, जो ब्रह्मांड के इतिहास में पहली बार हुआ। धर्मराज और चित्रगुप्त परेशान हैं। वहाँ आए नारद मुनि यह जानकर स्वयं जीव की खोज में पृथ्वी पर जाने का निर्णय लेते हैं।

चित्रगुप्त बताते हैं कि भोलाराम मामूली क्लर्क था, पाँच वर्ष पहले सेवानिवृत्त हुआ पर पेंशन न मिलने के कारण भूख से तड़प-तड़प कर मरा।

पेंशन दफ्तर की लालफीताशाही

नारद भोलाराम की विधवा से मिलते हैं, जो बताती है कि उसे केवल 'पेंशन की बीमारी' थी, पाँच वर्षों में सैकड़ों प्रार्थना-पत्रों का एक ही उत्तर मिला: 'विचार किया जा रहा है।' नारद पेंशन दफ्तर पहुँचते हैं, जहाँ क्लर्क कहता है कि कागज़ों पर 'पेपर-वेट' नहीं, असली 'वजन' (रिश्वत) रखना पड़ता है।

साहब के कमरे में साहब नारद की सुरीली 'वीणा' अपनी बेटी के लिए माँग लेते हैं और बदले में भोलाराम की पेंशन का आर्डर निकालने का वादा करते हैं। नारद दुखी मन से वीणा दे देते हैं।

फाइल में अटका हुआ जीव

साहब भोलाराम की भारी फाइल मँगवाकर 'भोलाराम!' पुकारते हैं। तभी फाइल में से एक पतली आवाज़ आती है, 'क्या मेरी पेंशन का आर्डर आ गया?' भोलाराम का जीव स्वर्ग जाने से इनकार कर देता है क्योंकि उसका मन अपनी पेंशन की दरख्वास्तों में ही अटका हुआ है। भ्रष्टाचार की इस पराकाष्ठा पर नारद अवाक रह जाते हैं।