महत्त्वाकांक्षा और लोभ
by पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
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मनुष्य की इच्छाओं का कभी अंत नहीं होता; अति करने से अमृत भी जहर बन जाता है। मछुआ और लोभी मछुई की कहानी से लोभ व असंतोष के विनाशकारी परिणाम दिखाए गए हैं, मछुई घर, महल, रानी और अंत में भगवान बनने की जिद करती है, जिससे जादुई मछली रुष्ट होकर उन्हें पुनः पुरानी झोपड़ी में भेज देती है।
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लोभ का दार्शनिक विश्लेषण
लेखक मानव स्वभाव की सबसे बड़ी कमजोरी 'लोभ' का विश्लेषण करते हैं। ऊँचाइयाँ छूने की महत्त्वाकांक्षा अच्छी है, पर जब वह 'लोभ' बन जाती है तो विनाश निश्चित है।
मछुआ-मछुई की लोककथा में एक जादुई मछली मछुआरे की इच्छाएँ पूरी करती है, पर मछुई की अति-महत्त्वाकांक्षा (भगवान बनने की जिद) के कारण मछली रुष्ट होकर उन्हें फिर से पुरानी झोपड़ी व गरीबी में भेज देती है। असंतोष ही सभी दुखों की जड़ है।
