कलम का सिपाही
by डॉ. सुनील देवधर
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डॉ. सुनील देवधर ने रेडियो रूपक विधा के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद को 'कलम का सिपाही' के रूप में प्रस्तुत किया है। प्रेमचंद (मूल नाम धनपतराय) ने अभावों में पलकर भी अपनी कलम से किसानों (होरी) और मजदूरों की आवाज़ बुलंद की। होरी, अलोपीदीन, वंशीधर जैसे पात्रों के माध्यम से उनके कालजयी उपन्यासों की झलक दिखाई गई है।
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प्रेमचंद का संघर्ष व साहित्य
यह नाटक प्रेमचंद के बचपन (धनपतराय) से शुरू होता है। अत्यंत गरीबी में पले-बढ़े प्रेमचंद ने अपनी कलम की ताकत से समाज के सबसे शोषित वर्ग, किसानों और मजदूरों की आवाज़ को बुलंद किया। 'गोदान' का होरी, 'नमक का दरोगा' के वंशीधर व अलोपीदीन जैसे पात्र उनकी यथार्थवादी दृष्टि के प्रतीक हैं।
रूपक में प्रेमचंद की कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और सामाजिक कुरीतियों (जमींदारी शोषण, कर्ज का बोझ, पुलिस की अकर्मण्यता) के खिलाफ उनके संघर्ष को दर्शाया गया है।
