तत्सत
by जैनेंद्र कुमार
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घने जंगल में सैकड़ों वर्ष पुराना बरगद (बड़ दादा) यह समझ नहीं पाता कि मनुष्य जिसे 'जंगल' कहते हैं वह क्या है। बाँस, सिंह आदि अपनी संकीर्ण दृष्टि से जंगल के अस्तित्व को नकारते हैं। अंत में एक घास का तिनका समझाता है कि सब मिलकर जो विराट रूप बनाते हैं वही 'जंगल' है। 'तत्सत' अर्थात वही एकमात्र सत्य है।
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सत्य की खोज
बड़ दादा (बरगद) शांत व गंभीर हैं। दो शिकारी 'जंगल' की बात करके चले जाते हैं तो बड़ दादा हैरान होते हैं कि जंगल क्या है, उन्होंने तो केवल मिट्टी, पानी, हवा, धूप और पेड़ देखे हैं। बाँस, बबूल, सेमर सभी अपनी संकीर्णता से जंगल को नकारते हैं; सिंह भी दहाड़कर कहता है कि केवल मैं और मेरा पराक्रम है।
अंत में एक बुद्धिमान घास का तिनका समझाता है कि तुम सब मिलकर जो विराट रूप बनाते हो, वही जंगल है। सत्य हमारे अहंकार से बहुत बड़ा है, 'तत्सत' अर्थात वही सत्य है जिसे संकीर्ण बुद्धि से देखा नहीं जा सकता।
