कोकोलोमाया
by श्याम दरहरे (अनुवाद: वैद्यनाथ झा) · translated by वैद्यनाथ झा (मैथिली से हिंदी)
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अनाथ दिलीप को उसकी मौसी 'कोकोलोमाया' अपने सगे बेटे की तरह पालती है। दिलीप पढ़-लिखकर लंदन चला जाता है और मौसी को भूल जाता है। मौसी के अंतिम समय में लौटने पर वह उसका चेहरा छूकर आँखें बंद कर लेती है; दिलीप पश्चाताप में फूट-फूटकर रोता है।
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निस्वार्थ ममता व पश्चाताप
मैथिली कथाकार श्याम दरहरे की यह करुण कथा निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति मौसी 'कोकोलोमाया' पर केंद्रित है। सगी माँ के देहांत के बाद मौसी दिलीप को अपने सुख त्यागकर सगे बेटे की तरह पालती है, कहती है कि दिलीप उसकी 'कोखजाया' संतान से बढ़कर है।
दिलीप उच्च शिक्षा हेतु लंदन जाकर शहरी चकाचौंध में मौसी का प्रेम भूल जाता है। वर्षों बाद मौसी की गंभीर बीमारी की खबर पर लौटता है, पर मौसी उसे देखकर काँपती उँगलियों से चेहरा छूकर आँखें मूँद लेती है। दिलीप शव से लिपटकर रोता है, उसने दुनिया की सबसे कीमती चीज़ खो दी।
