मध्ययुगीन काव्य (गुरु नानक व वृंद के दोहे)
by गुरु नानक / संत वृंद
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गुरु नानक कहते हैं कि बिना गुरु के ब्रह्मज्ञान नहीं मिलता; सच्ची आरती वही है जो प्रकृति स्वयं भगवान की कर रही है (आकाश की थाली में सूर्य-चंद्र के दीपक)। वृंद के दोहे कहते हैं कि विद्या रूपी धन खर्च करने से बढ़ता है, तथा जितनी लंबी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए।
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गुरुबानी की महाआरती
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक गुरु को प्रकाश स्तंभ मानते हैं जो अज्ञान का अंधकार मिटाकर ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। उनके 'आरती पद' में कहा गया है कि मंदिरों की कृत्रिम आरती की आवश्यकता नहीं, पूरी प्रकृति उनकी महाआरती कर रही है: नीला आकाश थाली, सूर्य-चंद्र दीपक, हवा चँवर और वन के फूल पूजा-सामग्री हैं।
वृंद के नीति दोहे
वृंद के दोहे व्यावहारिक जीवन की कुंजी हैं, विद्या का ज्ञान बाँटने से बढ़ता है, जमा करने से नष्ट होता है; अपनी सीमा पहचानकर ही व्यय करना चाहिए ('तेते पाँव पसारिए, जेती लांबी सौर'); तथा दुष्ट से उलझने से बचना चाहिए क्योंकि कीचड़ में पत्थर फेंकने पर छींटे अपने ही कपड़ों पर उड़ते हैं।
