सुनो किशोरी
by आशा रानी वोहरा
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लेखिका अपनी बेटी को लिखे पत्रों में समझाती हैं, 'उड़ो बेटी उड़ो! पर धरती पर निगाह रखकर।' समय के साथ अनुपयोगी हो चुके मूल्य 'रूढ़ि' हैं, जबकि जीवन को गतिशील व पवित्र बनाने वाली बहती धारा 'परंपरा' है। लड़कियाँ आत्मनिर्भर बनें पर अपनी जड़ों से जुड़ी रहें।
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रूढ़ि बनाम परंपरा
लेखिका कहती हैं कि आज की पीढ़ी पुराने मूल्यों को पूरी तरह काटकर पश्चिमी रहन-सहन का अंधानुकरण कर रही है। पर हर विदेशी मूल्य हमारी सामाजिक मिट्टी के अनुकूल नहीं होता। जो विचार उपयोगिता खो चुके हैं व समाज को पीछे धकेलते हैं वे 'रूढ़ि' हैं जिन्हें छोड़ देना चाहिए; जो मूल्य निरंतर गतिशील रहकर समाज को परिष्कृत करते हैं वे जीवंत 'परंपरा' हैं।
लड़कियों को पढ़ना-लिखना, आत्मनिर्भर बनना चाहिए, पर अपने संस्कारी पैर अपनी ज़मीन पर जमाए रखने चाहिए।
