आज़ादी
by बालचंद्रन चुल्लिक्काड (मलयालम) · translated by असद ज़ैदी
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'आज़ादी' मलयालम कवि बालचंद्रन चुल्लिक्काड की एक विचारोत्तेजक कविता है (हिंदी अनुवाद: असद ज़ैदी), जो एक दर्जी (उस्ताद) और उसके शागिर्द के संवाद के रूप में आज़ादी का सच्चा अर्थ समझाती है। शागिर्द पूछता है कि आज़ादी क्या है, क्या यह चरागाह में उछलता नन्हा बछड़ा है, या सूरज में घोंसला बनाने उड़ती चिड़िया, या उत्तर दिशा में सीटी बजाती रेलगाड़ी, या अँधेरे में राह दिखाता लैंपपोस्ट, या निश्चिंत नींद, या इस अनंत कपड़े, कभी न रुकने वाले पहिए और सुई से मुक्ति? दर्जी उत्तर देता है कि आज़ादी का असली मतलब है, भूखे को खाना, प्यासे को पानी, ठिठुरते को ऊनी कपड़ा और थके को बिस्तर; कवि के लिए वह शब्द है, शिकारी के लिए तीर, अकेले के लिए महफ़िल और डरे हुए के लिए पनाह; आज़ादी यानी अज्ञानी को ज्ञान, ज्ञानी को कर्म, कर्मठ को बलिदान और बलिदानी को जीवन। पर जो कपड़े नहीं सिएगा, वह सपने भी नहीं देख सकेगा, आज़ादी सुई की चमकीली नोक पर टिकी है। वह ऐसी फसल है जिसे बोने वाला ही काट सकता है, ऐसी रोटी जिसे मेहनती ही खा सकता है और ऐसा कपड़ा जिसे दर्जी ही पहन सकता है। इतना कहकर दर्जी फिर सिलाई में जुट जाता है और शागिर्द की उलझन दूर हो जाती है। कविता का मर्म यह है कि आज़ादी और अधिकार परिश्रम तथा कर्तव्य से जुड़े हैं, वे उसी को मिलते हैं जो मेहनत करता है।
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शागिर्द का प्रश्न
एक शागिर्द अपने उस्ताद (दर्जी) से पूछता है कि आज़ादी क्या होती है। वह स्वयं कई उपमाएँ देता है, क्या आज़ादी चरागाह में बेफ़िक्र उछलता बछड़ा है, असंभव-सा काम करने का दुस्साहस दिखाती (सूरज में घोंसला बनाने उड़ती) चिड़िया है, उत्तर दिशा में दौड़ती रेलगाड़ी है, अँधेरे में राह दिखाने वाला लैंपपोस्ट है, निश्चिंत नींद है, या फिर इस कभी न खत्म होने वाले कपड़े, घूमते पहिए और चलती सुई से छुटकारा है?
दर्जी का उत्तर, आज़ादी के अनेक रूप
दर्जी समझाता है कि आज़ादी का मतलब है भूखे को खाना, प्यासे को पानी, ठिठुरते को ऊनी कपड़ा और थके को बिस्तर। हर व्यक्ति के लिए उसका अर्थ अलग है, कवि के लिए शब्द, शिकारी के लिए तीर, अकेले के लिए महफ़िल, डरे के लिए पनाह। आज़ादी अज्ञानी को ज्ञान, ज्ञानी को कर्म, कर्मठ को बलिदान और बलिदानी को (अमर) जीवन देती है।
आज़ादी परिश्रम पर टिकी है
दर्जी कहता है कि जो कपड़े नहीं सिएगा, वह सपने भी नहीं देख सकेगा, आज़ादी सुई की चमकीली नोक पर टिकी है। वह ऐसी फसल है जिसे बोने वाला ही काट सकता है, ऐसी रोटी जिसे मेहनती ही खा सकता है और ऐसा कपड़ा जिसे दर्जी ही पहन सकता है। इतना कहकर वह फिर सिलाई में जुट जाता है और शागिर्द की उलझन दूर हो जाती है, अर्थात् आज़ादी कर्म और परिश्रम से ही सार्थक होती है।
