चंद्रगहना से लौटती बेर
by केदारनाथ अग्रवाल
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'चंद्रगहना से लौटती बेर' केदारनाथ अग्रवाल की एक सुंदर प्रकृति-चित्रण कविता है, जिसमें कवि चंद्रगहना नामक गाँव से लौटते हुए खेत की मेंड़ पर अकेला बैठकर ग्रामीण प्रकृति के मोहक दृश्यों का मानवीकरण करता है। उसे छोटे कद का हरा चना गुलाबी फूल की पगड़ी बाँधे सजा-सँवरा दूल्हा लगता है; पास उगी दुबली-पतली, लचीली और हठीली अलसी नीला फूल सिर पर चढ़ाए मानो कह रही है कि जो उसे छुए, वह उसे अपने हृदय का दान दे देगी; सबसे 'सयानी' सरसों हाथ पीले किए ब्याह-मंडप में पधार गई है और फागुन मास फाग गाता आ पहुँचा है, मानो प्रकृति का स्वयंवर हो रहा हो। कवि कहता है कि व्यापारिक नगर से दूर यह निर्जन, प्रेम की प्रिय भूमि अधिक उपजाऊ है। फिर वह पैरों तले के पोखर की लहरों, पानी में चाँदी के गोल खंभे जैसे चंद्रबिंब, चुपचाप पानी पीते किनारे के पत्थरों (जिनकी प्यास कभी नहीं बुझती), टाँग डुबाए ध्यानमग्न बगुले और एक चतुर काले माथे वाली सफ़ेद पंखों वाली चिड़िया का चित्र खींचता है, जो झपटकर उजली चंचल मछली को चोंच में दबाकर आकाश में उड़ जाती है। कविता ग्रामीण प्रकृति के निश्छल, जीवंत सौंदर्य और उसके प्रति कवि के गहरे प्रेम को व्यक्त करती है।
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खेतों का स्वयंवर, चना, अलसी और सरसों
चंद्रगहना से लौटते हुए कवि खेत की मेंड़ पर अकेला बैठा है। एक बित्ते भर का हरा ठिगना चना उसे गुलाबी फूल की पगड़ी बाँधे सजा हुआ दूल्हा लगता है। पास उगी दुबली-पतली, कमर से लचीली और हठीली अलसी नीला फूल सिर पर चढ़ाए मचलती हुई मानो कहती है कि जो उसे छुएगा, उसे वह अपने हृदय का दान दे देगी।
सबसे सयानी सरसों हाथ पीले किए ब्याह-मंडप में पधार गई है और फाग गाता फागुन मास आ पहुँचा है। कवि को लगता है मानो प्रकृति का स्वयंवर हो रहा है और उसका अनुराग-भरा आँचल हिल रहा है। व्यापारिक नगर से दूर यह प्रेम की प्रिय भूमि अधिक उपजाऊ है।
पोखर, पत्थर और चंद्रबिंब
कवि पैरों तले के पोखर का वर्णन करता है, जिसमें लहरें उठ रही हैं और तल में भूरी घास भी लहरा रही है। पानी में पड़ता चंद्रमा का प्रतिबिंब चाँदी के बड़े गोल खंभे-सा आँखों को चौंधिया रहा है। किनारे के पत्थर चुपचाप पानी पी रहे हैं, पर उनकी प्यास जाने कब बुझेगी।
बगुला और चतुर चिड़िया
जल में टाँग डुबाए बगुला ध्यानमग्न-सा चुप खड़ा है, पर मछली दिखते ही ध्यान त्यागकर चट से उसे चोंच में दबाकर गले के नीचे उतार लेता है। तभी एक काले माथे वाली चतुर चिड़िया सफ़ेद पंखों के झपाटे मारती जल के हृदय पर टूट पड़ती है और एक उजली चंचल मछली को अपनी पीली चोंच में दबाकर आकाश में उड़ जाती है, प्रकृति के जीवन-चक्र का सजीव चित्र।
