भारत की ये बहादुर बेटियाँ
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'भारत की ये बहादुर बेटियाँ' एक प्रेरक निबंध है, जो भारतीय नारी के अदम्य साहस, आत्मविश्वास और कर्तव्यनिष्ठा को दो महान बेटियों, कल्पना चावला और बचेंद्री पाल, के उदाहरण से रेखांकित करता है। निबंध बताता है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः' की परंपरा वाले हमारे देश में गार्गी, मैत्रेयी से लेकर स्वतंत्रता-संग्राम की सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ़ अली तक नारियों ने हर क्षेत्र में योगदान दिया है। आज महिलाएँ शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान, खेल, हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं। कल्पना चावला हरियाणा के करनाल में एक साधारण व्यापारी परिवार में जन्मीं; परिवार के विरोध और सहपाठियों के मज़ाक के बावजूद उन्होंने एअरोनॉटिकल इंजीनियरिंग पढ़ी, अमेरिका जाकर पीएच.डी. की और अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। 1 फ़रवरी 2003 को कोलंबिया यान की वापसी के समय भयानक विस्फोट में वे अपने सात साथियों सहित शहीद हो गईं; उनकी स्मृति में उपग्रह का नाम 'कल्पना-1' रखा गया। बचेंद्री पाल चमोली जिले के एक साधारण परिवार में जन्मीं; बड़े भाई के मना करने पर भी पर्वतारोहण की ठानी, सिलाई करके पढ़ाई का खर्च जुटाया और 23 मई 1984 को एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। निबंध का संदेश है कि साहस, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे कोई अभाव या कठिनाई टिक नहीं सकती।
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नारी की क्षमता और भागीदारी
प्राचीन काल से ही भारत में नारी सम्माननीय रही है, गार्गी, मैत्रेयी, अपाला जैसी विदुषियाँ इसका प्रमाण हैं। आधुनिक युग में शिक्षा और आत्मविश्वास से नारी ने स्वतंत्रता-संग्राम से लेकर अंतरिक्ष तक हर क्षेत्र में अपनी क्षमता सिद्ध कर दिखाई। आज कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहाँ महिलाएँ न हों, और उन्होंने अधिक क्रियाशील, ईमानदार व कुशल प्रशासक होकर देश-विदेश में भारत का नाम ऊँचा किया है।
कल्पना चावला, अंतरिक्ष में पहली भारतीय महिला
करनाल (हरियाणा) के साधारण परिवार में 1 जुलाई 1961 को जन्मीं कल्पना बचपन से अंतरिक्ष के सपने देखती थीं। परिवार के विरोध और सहपाठियों के मज़ाक की परवाह किए बिना उन्होंने एअरोनॉटिकल इंजीनियरिंग पढ़ी, अमेरिका जाकर एअरोस्पेस में पीएच.डी. की और कोलंबिया मिशन की विशेषज्ञ चुनी गईं।
दूसरी अंतरिक्ष-यात्रा से लौटते समय 1 फ़रवरी 2003 को यान में भयानक विस्फोट हुआ और वे अपने सात साथियों सहित अंतरिक्ष में ही खो गईं। उनकी स्मृति में उपग्रह का नाम 'कल्पना-1' रखा गया, उन्होंने अदम्य साहस और कर्तव्यनिष्ठा से देश का नाम विश्व-इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित कर दिया।
बचेंद्री पाल, पहली महिला एवरेस्ट विजेता
चमोली जिले में 1954 में एक साधारण परिवार में जन्मीं बचेंद्री को बड़े भाई के मना करने पर भी पहाड़ चढ़ने की ज़िद ने और दृढ़ बना दिया। आठवीं के बाद पिता ने खर्च देने से मना किया तो उन्होंने सिलाई करके पढ़ाई जारी रखी और संस्कृत में एम.ए. व बी.एड. किया।
तेनजिंग नोर्गे और जुंको ताबेई से मिलने के बाद उन्होंने एवरेस्ट का संकल्प लिया और 23 मई 1984 को दोपहर 1:07 बजे एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराकर यह गौरव पाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उनकी कहानी सिद्ध करती है कि आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे अभाव कोई बाधा नहीं।
