अंधेर नगरी
by भारतेंदु हरिश्चंद्र
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'अंधेर नगरी' भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक प्रसिद्ध व्यंग्य-प्रधान प्रहसन (छह दृश्यों का नाटक) है, जो अन्यायपूर्ण शासन-व्यवस्था और मूर्ख शासक पर तीखा व्यंग्य करता है। एक महंत (गुरु) अपने दो चेलों, नारायणदास और गोबरधनदास, के साथ एक नगर में भिक्षा माँगने आता है। गोबरधनदास देखता है कि इस नगर में हर चीज़, आटा, चावल, घी, मिठाई, साग, सब 'टके सेर' बिकती है। पता चलता है कि नगर का नाम 'अंधेर नगरी' और राजा का नाम 'चौपट राजा' है। महंत लोभ से बचने की सीख ('लोभ पाप को मूल है') देकर चला जाता है, पर लालची गोबरधनदास सस्ती मिठाई के मोह में वहीं रुक जाता है। तभी एक दीवार गिरने से एक व्यक्ति (कल्लू बनिया) दब कर मर जाता है, और मूर्ख राजा के दरबार में दोष एक से दूसरे पर मढ़ते-मढ़ते (राज-मिस्त्री, चूना बनाने वाला, भिश्ती, कसाई, गड़रिया, कोतवाल) अंततः किसी को फाँसी देने का तुगलकी फ़ैसला होता है। कोतवाल दुबला होने से फंदे में नहीं आता, तो आदेश होता है कि कोई 'मोटा' आदमी फाँसी चढ़ाया जाए, और मोटा गोबरधनदास पकड़ लिया जाता है। संकट में वह गुरु को पुकारता है। गुरु आकर चतुराई से चेले के कान में मंत्र फूँकता है, फिर घोषणा करता है कि इस समय ऐसी शुभ घड़ी (साइत) है कि जो मरेगा वह सीधा बैकुंठ जाएगा। यह सुनते ही सब, चेला, गुरु, मंत्री, कोतवाल, फाँसी चढ़ने को उतावले हो जाते हैं, और अंत में मूर्ख राजा 'राजा के रहते और कौन बैकुंठ जाए' कहकर स्वयं फाँसी चढ़ जाता है। इस प्रकार गुरु अपनी बुद्धि से चेले के प्राण बचा लेता है। नाटक का संदेश है कि जहाँ न्याय नहीं, विवेकहीन शासन है, वहाँ सच्चे लोग दुखी और छली-दुष्ट सम्मानित होते हैं, और ऐसा 'चौपट राज' अंततः स्वयं नष्ट हो जाता है।
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टके सेर की अंधेर नगरी
महंत अपने दो चेलों के साथ नगर में भिक्षा माँगने आता है और लोभ से बचने की सीख देता है। बाज़ार में गोबरधनदास देखता है कि आटा, चावल, चीनी, घी, साग-भाजी और मिठाई, सब कुछ 'टके सेर' बिक रहा है। हलवाई बताता है कि नगर का नाम 'अंधेर नगरी' और राजा 'चौपट राजा' है, जहाँ बिना मूल्य-विवेक के हर चीज़ एक ही भाव बिकती है।
लोभ और मूर्ख न्याय
महंत लोभ से बचने को कहकर चला जाता है, पर लालची गोबरधनदास सस्ती मिठाई के मोह में रुक जाता है। तभी एक दीवार गिरने से कल्लू बनिया दबकर मर जाता है। चौपट राजा के दरबार में दोष एक से दूसरे पर मढ़ा जाता है, राज-मिस्त्री, चूना बनाने वाला, भिश्ती, कसाई, गड़रिया और कोतवाल, और अंततः तय होता है कि अपराध का दंड किसी-न-किसी को अवश्य मिलना चाहिए।
गुरु की चतुराई और राजा का अंत
फंदा दुबले कोतवाल के गले में बड़ा पड़ता है तो 'मोटा' आदमी ढूँढा जाता है और मोटा गोबरधनदास पकड़ लिया जाता है। संकट में वह गुरु को पुकारता है। गुरु आकर चेले के कान में समझाता है और घोषणा करता है कि इस शुभ घड़ी (साइत) में जो मरेगा, सीधा बैकुंठ जाएगा। यह सुनकर सब फाँसी चढ़ने को उतावले हो जाते हैं, और अंत में 'राजा के रहते और कौन बैकुंठ जाए' कहकर मूर्ख राजा स्वयं फाँसी पर लटक जाता है। इस तरह गुरु अपनी बुद्धि से चेले के प्राण बचा लेता है।
