बूढ़ी पृथ्वी का दुख
by निर्मला पुतुल
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'बूढ़ी पृथ्वी का दुख' निर्मला पुतुल की एक मार्मिक पर्यावरण-कविता है, जिसमें मानवीकरण अलंकार के माध्यम से पेड़, नदी, पहाड़, हवा और पृथ्वी के दुख को मनुष्य के दुख के रूप में चित्रित किया गया है। कवयित्री प्रश्नों की श्रृंखला के द्वारा 'सभ्य समाज' से पूछती है, क्या तुमने कभी सपनों में चमकती कुल्हाड़ियों के भय से चीखते पेड़ों की चीत्कार सुनी है? कटकर पेड़ के गिरने पर क्या तुम्हारे भीतर धमस (आघात की गूँज) होती है? क्या तुमने रात के सन्नाटे में अँधेरे से मुँह ढाँपकर रोती नदियों को सुना है? विस्फोट से पत्थर छिटकने पर पहाड़ के सीने का दहलना, हथौड़ों से टूटते पत्थरों की चीख, और अपने घर के पिछवाड़े खून की उल्टियाँ करती हवा, क्या इन्हें कभी महसूस किया है? क्या कभी थोड़ा समय चुराकर शिकायत न करने वाली गुमसुम बूढ़ी पृथ्वी से उसका दुख बतियाया है? यदि नहीं, तो 'क्षमा करना, मुझे तुम्हारे आदमी होने पर संदेह है!' कविता का संदेश है कि उपभोक्तावादी स्वार्थ में अंधा होकर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करना अमानवीय है; सच्चा मनुष्य वही है जो प्रकृति और पृथ्वी की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझे और उसे बचाने का प्रयास करे।
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पेड़ों और नदियों की पीड़ा
कवयित्री कल्पना करती है कि मनुष्य की तरह पेड़ भी भयभीत होते हैं, उनके सपनों में चमकती कुल्हाड़ियाँ उन्हें काटने को तत्पर हैं और वे चीत्कार करते, बचाव के लिए हज़ारों हाथ (टहनियाँ) पुकारते हैं। वह पूछती है कि पेड़ के कटकर गिरने पर क्या तुम्हारे भीतर आघात की गूँज होती है, और क्या तुमने रात के सन्नाटे में अँधेरे से मुँह ढाँपकर रोती नदियों को सुना है, जिस घाट पर तुम कपड़े-मवेशी धोते हो, वहीं कोई प्यासा पानी पीता या स्त्री देवता को अर्घ्य चढ़ाती होगी।
पहाड़, हवा और बूढ़ी पृथ्वी
कवयित्री पूछती है कि विस्फोट से पत्थर छिटकने पर मौन समाधि में बैठे पहाड़ का सीना कितना दहलता है, भरी दुपहरी में हथौड़ों से टूटते पत्थरों की चीख कैसी होती है, और क्या तुमने अपने घर के पिछवाड़े खून की उल्टियाँ करती (प्रदूषित) हवा को देखा है। अंत में वह पूछती है कि क्या कभी थोड़ा समय चुराकर शिकायत न करने वाली गुमसुम बूढ़ी पृथ्वी से उसका दुख बतियाया है।
मनुष्यता पर प्रश्न
इन सभी प्रश्नों के बाद कवयित्री कठोर निष्कर्ष देती है, 'अगर नहीं, तो क्षमा करना! मुझे तुम्हारे आदमी होने पर संदेह है!!' अर्थात् जो व्यक्ति प्रकृति और पृथ्वी की पीड़ा को महसूस नहीं करता, वह सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने योग्य नहीं। सच्चा मनुष्य वही है जो स्वार्थ छोड़कर प्रकृति के कष्ट को अपना कष्ट समझे और पर्यावरण की रक्षा करे।
