अपना-पराया
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'अपना-पराया' एक रोचक विज्ञान-निबंध है, जो हमारे शरीर की अद्भुत सुरक्षा-व्यवस्था (प्रतिरक्षा तंत्र) और 'अपने' (शरीर के अपने) तथा 'पराए' (बाहरी/हानिकर) की पहचान की क्षमता को सरल भाषा में समझाता है। निबंध बताता है कि छींक आना, आँख से आँसू निकलना, काँटे के स्थान पर फोड़ा बनकर मवाद के साथ बाहर निकलना, ये सब शरीर की स्वाभाविक प्रतिरक्षात्मक प्रक्रियाएँ हैं। जीभ और आमाशय (पेट) द्वारपाल की तरह हानिकर पदार्थों को रोकते या उल्टी करके बाहर निकालते हैं। त्वचा शरीर रूपी दुर्ग की बाहरी दीवार है; नाक के बाल व श्लेष्मा, लार और आमाशय का अम्ल रोगाणुओं को रोकते हैं। भीतर घुस आए रोगाणुओं पर रक्त की श्वेत कणिकाएँ (भक्षक कोशिकाएँ) सेना की तरह धावा बोलती हैं। विषाणुओं और जीवाणुओं के विष (टॉक्सिन) से लड़ने के लिए लसिका ग्रंथियों में विशेष प्रतिपिंड (ऐंटीबॉडी) बनते हैं, जो प्रत्येक रोगाणु के अनुरूप अलग होते हैं; शरीर की स्मरण-शक्ति रोगाणु को लंबे समय बाद भी पहचान लेती है। इसी सिद्धांत पर बचाव-टीके (वैक्सीन), चेचक, पोलियो, टिटनेस, डिफ़्थीरिया, हैजा, टाइफ़ाइड, क्षय रोग आदि, बनते हैं, जिनमें दुर्बल रोगाणु या हल्का विष शरीर में डालकर प्रतिपिंड बनवाए जाते हैं। पराए प्रोटीनों के प्रति शरीर की तीव्र प्रतिक्रिया एलर्जी कहलाती है, और अपनी ही कोशिकाओं के 'पराई' (शरीर-द्रोही) बनकर अनियंत्रित बढ़ने पर कैंसर हो सकता है। निबंध का सार यह है कि हमारा और हमारी जाति का जीवित रहना बहुत हद तक इसी 'अपने-पराए की पहचान' के कारण संभव है।
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स्वाभाविक प्रतिरक्षा और द्वारपाल
छींक आना, आँख से आँसू निकलना और काँटे के स्थान पर फोड़ा बनकर मवाद के साथ बाहर निकल जाना, ये सब शरीर की स्वाभाविक सुरक्षात्मक प्रक्रियाएँ हैं, जो बेमेल और हानिकर पदार्थों को बाहर निकालती हैं। जीभ द्वारपाल की तरह स्वाद परखकर कड़वे-बुरे पदार्थ भीतर जाने से रोकती है, और आमाशय बिना पचे या हानिकर वस्तु को उल्टी के रूप में बाहर फेंक देता है।
शरीर की दीवारें और श्वेत कणिकाओं की सेना
त्वचा शरीर रूपी दुर्ग की बाहरी दीवार है; नाक के बाल व श्लेष्मा, फेफड़ों का बलगम, मुँह की लार और आमाशय का अम्ल रोगाणुओं को रोकते और नष्ट करते हैं। जब त्वचा कटने-फटने पर रोगाणु भीतर घुस जाते हैं, तो रक्त की श्वेत कणिकाओं की सेना (भक्षक कोशिकाएँ) सतर्क होकर उन पर धावा बोल देती है और उन्हें खा जाती है, इसी संघर्ष से फोड़े में मवाद और गिलटियों (टॉन्सिल आदि) की सूजन बनती है।
प्रतिपिंड, टीके, एलर्जी और कैंसर
विषाणुओं और जीवाणुओं के विष (टॉक्सिन) से लड़ने के लिए लसिका ग्रंथियों में विशेष प्रतिपिंड (ऐंटीबॉडी) बनते हैं; प्रत्येक रोगाणु के लिए अलग प्रतिपिंड चाहिए और शरीर की स्मरण-शक्ति उसे लंबे समय बाद भी पहचान लेती है। इसी सिद्धांत पर टीके (वैक्सीन) बनते हैं, दुर्बल रोगाणु या हल्का विष डालकर शरीर से पहले ही प्रतिपिंड बनवा लिए जाते हैं।
जब शरीर पराए प्रोटीनों के प्रति तीव्र प्रतिक्रिया करता है तो एलर्जी (छपाकी, सूजन, दमा) होती है, जो एक के लिए 'अपना' है वह दूसरे के लिए 'पराया' हो सकता है। कभी-कभी शरीर की अपनी ही कोशिकाएँ 'पराई' (शरीर-द्रोही) बनकर अनियंत्रित बढ़ जाती हैं और कैंसर का रूप ले लेती हैं। इस प्रकार हमारा जीवित रहना बहुत हद तक 'अपने-पराए की पहचान' के अद्भुत तंत्र पर निर्भर है।
