Class 10 (Secondary)कविता (प्रभाती)हिन्दी माध्यमिक पाठ्यक्रम

बीती विभावरी जाग री

by जयशंकर प्रसाद

Read in

Rapid Learn 2-Minute Revision

Perfect for last-minute revision

2-Minute Revision Video

Video coming soon

'बीती विभावरी जाग री' जयशंकर प्रसाद की एक कोमल-मधुर प्रभाती कविता है, जो उनके काव्य-संग्रह 'लहर' से ली गई है। इसमें एक सखी दूसरी सोई हुई सखी को जगाते हुए कहती है कि रात बीत गई है, अब जाग जाओ। कवि रूपक अलंकार के माध्यम से भोर का सुंदर चित्र खींचते हैं, उषा रूपी नागरी (स्त्री) आकाश रूपी पनघट में तारे रूपी घड़ों को डुबो रही है (अर्थात् सवेरा हो रहा है, तारे डूब रहे हैं)। पक्षियों का समूह 'कुल-कुल' कलरव कर रहा है, कोंपलों (किसलय) का आँचल डोल रहा है, और लता भी मधु-मुकुल (अधखिले फूलों) की नयी रसभरी गागरी भर लाई है। सखी कहती है कि तेरे अधरों में मंद न पड़ने वाला राग (प्रेम-रस) और केशों में सुगंधित मलयज पवन बंद है, आँखों में विहाग राग भरा है, फिर भी तू अब तक क्यों सोई है? कविता का दूसरा (आलंकारिक) अर्थ स्वतंत्रता-संग्राम के जन-जागरण से जुड़ा है, जब सारा संसार हलचल में है, तब सारी सामर्थ्य होते हुए भी सोए रहने का क्या अर्थ? इसलिए सोओ मत, जागो। इस प्रकार प्रकृति के मनोहर सौंदर्य-चित्रण के साथ-साथ कविता जागरण और सक्रियता का संदेश देती है।

Detailed Summary

Detailed Summary Video

Video coming soon

भोर का रूपक-चित्र

सखी कहती है, 'बीती विभावरी जाग री।' रात बीत गई है और भोर हो रही है। कवि रूपक के द्वारा दृश्य रचते हैं, उषा रूपी स्त्री आकाश रूपी पनघट में तारे रूपी घड़ों को डुबो रही है, अर्थात् सवेरा होते ही आकाश के तारे डूब रहे हैं। (उपमेय-उपमान: अंबर=पनघट, तारा=घड़ा, उषा=नागरी।)

जागती प्रकृति का संगीत

पक्षियों का समूह 'कुल-कुल' मधुर कलरव कर रहा है, नयी कोंपलों (किसलय) का अंचल हवा में डोल रहा है, और लता भी मधु से भरे अधखिले फूलों (मुकुल) की नयी रसभरी गागरी भर लाई है। इस प्रकार सारी प्रकृति अपने सौंदर्य और संगीत के साथ जाग उठी है।

सखी को जगाने का आह्वान और गूढ़ अर्थ

सखी कहती है कि तेरे अधरों में मंद न पड़ने वाला राग (प्रेम-रस), केशों में बंद सुगंधित मलयज पवन और आँखों में विहाग राग भरा है, इतना सौंदर्य और सामर्थ्य होते हुए भी तू अब तक क्यों सोई है? इसका गूढ़ अर्थ स्वतंत्रता-संग्राम के जन-जागरण से है, जब सारा संसार हलचल में जाग रहा है, तब निष्क्रिय सोए रहना उचित नहीं; उठो और जागो।