Class 10 (Secondary)ललित निबंध (गद्य)हिन्दी माध्यमिक पाठ्यक्रम

नाखून क्यों बढ़ते हैं?

by हजारीप्रसाद द्विवेदी

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'नाखून क्यों बढ़ते हैं?' हजारीप्रसाद द्विवेदी का एक विचारप्रधान ललित निबंध है, जो एक बालसुलभ प्रश्न से आरंभ होकर मनुष्य की पशुता और मनुष्यता के गहरे प्रश्न तक पहुँचता है। लेखक की छोटी बेटी पूछती है कि आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं, और वह सोच में पड़ जाता है। वह बताता है कि लाखों वर्ष पहले जब मनुष्य जंगली था, तब नाखून उसके प्रमुख अस्त्र (और दाँत सहायक) थे; फिर उसने पत्थर, हड्डी (जैसे दधीचि की हड्डियों से बना इंद्र का वज्र) और अंततः लोहे के हथियार बनाए, लोहे के अस्त्रों वाले आर्य विजयी हुए। आज मनुष्य एटम-बम तक पहुँच गया है, फिर भी उसके नाखून बढ़ रहे हैं, मानो प्रकृति याद दिला रही हो कि तुम अब भी वही 'नखदंतावलंबी' पशु हो। लेखक के अनुसार बढ़ते नाखून मनुष्य की पाशवी वृत्ति (पशुता) के जीवंत प्रतीक हैं, जिन्हें कितनी ही बार काटो, वे मरती नहीं; और नाखून काटना उसकी मनुष्यता की निशानी है। अस्त्र-शस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति भी उसी पशुता का प्रमाण है, जबकि उन्हें रोकना-काटना मनुष्यता है, हिरोशिमा का हत्याकांड इसी बर्बरता का नया रूप है। निबंध के अंत में लेखक 'इंडिपेंडेंस' (अनधीनता) और भारतीय 'स्वाधीनता/स्वतंत्रता/स्वराज्य' के अंतर से यह स्थापित करता है कि भारतीय परंपरा में सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ 'स्व' का बंधन अर्थात् आत्म-संयम है, मनुष्य की महानता असीम शक्ति में नहीं, आत्मनियंत्रण और मनुष्यता में है।

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बालिका का प्रश्न और अस्त्रों का इतिहास

लेखक की छोटी बेटी पूछती है कि आदमी के नाखून क्यों बढ़ते हैं, यह चक्कर में डालने वाला प्रश्न उसे सोचने पर विवश कर देता है। वह बताता है कि लाखों वर्ष पहले जंगली मनुष्य के लिए नाखून जीवन-रक्षा के प्रमुख अस्त्र थे। धीरे-धीरे उसने पत्थर, हड्डी (इंद्र का वज्र दधीचि की हड्डियों से बना) और फिर लोहे के हथियार बनाए; लोहे के अस्त्रों वाले आर्य विजयी हुए, और इतिहास बंदूक, तोप, बम, बमवर्षक विमानों से होता हुआ एटम-बम तक पहुँच गया।

पशुता का प्रतीक और मनुष्यता की निशानी

फिर भी मनुष्य के नाखून आज भी बढ़ते हैं, प्रकृति याद दिलाती है कि वह अब भी वही 'नखदंतावलंबी' पशु है। लेखक के अनुसार बढ़ते नाखून मनुष्य की पाशवी वृत्ति के जीवंत प्रतीक हैं, जो कितनी ही बार काटे जाने पर भी नहीं मरते; और नाखून काटना उसकी मनुष्यता की निशानी है। इसी तरह अस्त्र-शस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति पशुता है और उन्हें रोकना मनुष्यता, हिरोशिमा का हत्याकांड इसी बर्बरता का नया रूप है।

स्वाधीनता का अर्थ, आत्म-संयम

लेखक सहजात वृत्तियों (नाखून-केश का बढ़ना आदि) को 'अनजानी स्मृतियाँ' बताते हैं। अंत में वह 'इंडिपेंडेंस' (अनधीनता, किसी की अधीनता का अभाव) और भारतीय 'स्वाधीनता/स्वतंत्रता/स्वराज्य' के अंतर से यह स्थापित करते हैं कि भारतीय परंपरा में सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ 'स्व' का बंधन, अर्थात् आत्म-संयम है। मनुष्य की महानता असीम, उच्छृंखल शक्ति में नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण, प्रेम और मनुष्यता में है, उसे पशुता की नहीं, मनुष्यता की ओर बढ़ना चाहिए।