शतरंज के खिलाड़ी
by प्रेमचंद
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'शतरंज के खिलाड़ी' प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध व्यंग्यपूर्ण, वातावरण-प्रधान कहानी है, जो नवाब वाजिद अली शाह के समय (लगभग 1856-57) के विलासी और पतनोन्मुख अवध की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। उस समय लखनऊ राजा से रंक तक विलासिता के रंग में डूबा था। दो सामंत मित्र, मिरज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली, दिन-रात शतरंज खेलने में इतने लीन रहते हैं कि उन्हें घर-परिवार, कर्तव्य या देश की कोई चिंता नहीं। मिरज़ा की बेगम इस खेल से चिढ़ती है; एक बार सिर-दर्द के बहाने बुलाने पर भी मिरज़ा बाजी छोड़कर नहीं जाते। घरवालों और नौकरों के तानों से तंग होकर दोनों मित्र शहर छोड़कर गोमती के पार एक उजाड़ मस्जिद में जाकर खेलने लगते हैं। इसी बीच अंग्रेज़ी (कंपनी की) फ़ौज बिना किसी विरोध के लखनऊ में घुस आती है और नवाब वाजिद अली शाह को कैद कर लिया जाता है, पर इन दोनों को इसकी कोई परवाह नहीं; मिरज़ा 'हाय, गरीब वाजिद अली शाह' कहकर झूठी सहानुभूति दिखाते हैं और फिर चाल चलने लगते हैं। अंत में खेल में हार-जीत को लेकर दोनों में कहासुनी होती है, बात खानदान के अपमान तक पहुँचती है, और झूठी नवाबी शान में आकर वे तलवारें खींचकर एक-दूसरे को मारकर वहीं ढेर हो जाते हैं। जो अपने असली बादशाह और देश के लिए खून की एक बूँद न बहा सके, वे लकड़ी के शतरंजी बादशाह के लिए अपनी जान दे देते हैं। कहानी उस निकम्मे, पलायनवादी सामंती वर्ग पर तीखा व्यंग्य है, जिसकी विलासिता और कर्तव्यहीनता के कारण भारत गुलाम हुआ।
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विलासी लखनऊ और शतरंज के दीवाने
वाजिद अली शाह के समय लखनऊ विलासिता में डूबा था, राजा से रंक तक सब आमोद-प्रमोद में लिप्त थे। इसी माहौल में मौरूसी जागीरों के मालिक मिरज़ा सज्जाद अली और मीर रौशन अली दिनभर शतरंज खेलते रहते; उन्हें खाने-पीने और समय तक का होश न रहता। घरवाले, मुहल्ले और नौकर इस 'मनहूस खेल' पर ताने कसते कि यह घर को तबाह कर देता है।
कर्तव्य और परिवार की उपेक्षा
मिरज़ा की बेगम इस खेल से बेहद चिढ़ती हैं; एक बार सिर-दर्द के बहाने बुलाने पर भी मिरज़ा बाजी अधूरी छोड़कर नहीं जाते, और मीर उन्हें रोक लेते हैं। घर के तानों से तंग होकर दोनों मित्र शहर छोड़कर गोमती पार एक उजाड़ मस्जिद में जाकर निश्चिंत होकर खेलने लगते हैं, उन्हें न परिवार की चिंता है, न शासन की।
अवध का पतन और खिलाड़ियों का अंत
अंग्रेज़ी फ़ौज बिना किसी विरोध के लखनऊ में घुस आती है और नवाब वाजिद अली शाह को कैद कर लिया जाता है, पर इन दोनों को कोई परवाह नहीं, मिरज़ा 'हाय, गरीब वाजिद अली शाह' कहकर झूठी सहानुभूति जताते और फिर 'किश्त' देने लगते हैं।
अंत में खेल में हार-जीत पर दोनों में कहासुनी बढ़ती है, बात खानदान के अपमान तक पहुँचती है और झूठी नवाबी शान में वे तलवारें खींचकर एक-दूसरे को मार डालते हैं। जो अपने बादशाह और देश के लिए खून की एक बूँद न बहा सके, वे लकड़ी के शतरंजी बादशाह के लिए अपनी जान गँवा देते हैं, यही प्रेमचंद का करारा व्यंग्य है।
